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________________ ६६ महापुराणे उत्तरपुराणम् मालिनी इदमिति विधिपाकाद् वृत्तमस्मिन् द्विपृष्ठे परिणतमचले च प्रत्यहं चिन्तयित्वा । विपुलमतिभिरायैः कार्यमुत्सृज्य पापं Jain Education International सकलसुखनिधानं पुण्यमेव प्रतीपम् ॥ १२१ ॥ पृथ्वी पुरेऽत्र कनकादिके प्रथितवान् सुषेणो नृपः ततोऽनु तपसि स्थितोऽजनि चतुर्दशस्वर्गभाक् । त्रिखण्डपरिपालकोऽभवदतो द्विपृष्ठाख्यया परिग्रह महाभरादुपगतः क्षितिं सप्तमीम् ॥ १२२ ॥ वंशस्थवृत्तम् महापुरे वायुरथो महीपतिः प्रपद्य चारित्रमनुत्तरं ययौ । ततो बलो द्वारवतीपुरेऽचलत्रिलोकपूज्यत्वमवाप्य निर्वृतः ॥ १२३ ॥ वसन्ततिलका विख्यातविन्ध्य नगरेऽजनि विन्ध्यशक्ति भ्रन्त्वा चिरं भववने चितपुण्य लेशः । श्रीभोगवर्द्धनपुराधिपतारकाख्यः प्राप द्विष्टरिपुरन्त्यमहीं ' महांहाः ॥ १२४ ॥ इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे वासुपूज्यजिनपतिद्विपृष्ठाचलतारकपुराणं परिसमाप्तम् अष्टपञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५८ ॥ +++++ किसी पुण्यका बीज पाकर तीन खण्डकी पृथिवी पाई, अनेक विभूतियाँ पाई और साथ ही साथ उत्तम पद प्राप्त किया परन्तु उनमें से एक तो अंकुर के समान फल प्राप्त करनेके लिए ऊपरकी ओर (मोक्ष) गया और दूसरा पापसे युक्त होनेके कारण फलरहित जड़के समान नीचे की ओर (नरक) गया ।। १२० ।। इस प्रकार द्विपृष्ठ तथा अचलका जो भी जीवन-वृत्त घटित हुआ है वह सब कर्मों से ही घटित हुआ है ऐसा विचार कर विशाल बुद्धिके धारक आर्य पुरुषोंको पाप छोड़कर उसके विपरीत समस्त सुखोंका भंडार जो पुण्य है वही करना चाहिए ।। १२१ ।। राजा द्विपृष्ठ पहले इसी भरतक्षेत्रके कनकपुर नगरमें सुषेण नामका प्रसिद्ध राजा हुआ, फिर तपश्चरण कर चौदहवें स्वर्गमें देव हुआ, तदनन्तर तीन खण्डकी रक्षा करनेवाला द्विपृष्ठ नामका अर्धचक्री हुआ और इसके बाद परिग्रहके महान् भारसे मरकर सातवें नरक गया ।। १२२ ।। बलभद्र, पहले महापुर नगरमें वायुरथ राजा हुआ, फिर उत्कृष्ट चारित्र प्राप्त कर उसी प्राणत स्वर्गके अनुत्तरविमानमें उत्पन्न हुआ, तदनन्तर द्वारावती नगरी में अचल नामका बलभद्र हुआ और अन्तमें निर्वाण प्राप्त कर त्रिभुवनके द्वारा पूज्य हुआ ।। १२३ ।। प्रतिनारायण तारक, पहले प्रसिद्ध विन्ध्यनगरमें विन्ध्यशक्ति नामका राजा हुआ, फिर चिरकाल तक संसार- वनमें भ्रमण करता रहा । कदाचित् थोड़ा पुण्यका संचय कर श्री भोगवर्द्धन नगरका राजा तारक हुआ और अन्तमें द्विपृष्ठनारायणका शत्रु होकर उनके हाथसे मारा जाकर महापापके उदयसे अन्तिम पृथिवीमें नारकी उत्पन्न हुआ ।। १२४ ।। प्रकार नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रतिनारायणका वर्णन करनेवाला अट्ठावनवाँ पर्व पूर्ण हुआ । ++++ १ महत् अंहः पापं यस्य स महांहाः महापापः । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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