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________________ अष्टपञ्चाशत्तम पर्व ६५ इत्यादि तेन गम्भीरमभ्युद्य स विसर्जितः । पवमान इव प्राप्य तत्कोपानिमदीपयत् ॥ १० ॥ तच्छ्रुत्वा सोऽपि कोपानिप्रदीप्तः पावकप्रभः। तौ पतङ्गायिताविर्थ मत्क्रोधानेरवोचताम् ॥ १०८॥ इत्यनालोच्य कार्याङ्ग सङ्गतः सचिवैः समम् । स्वयमभ्युत्थितं मत्वा प्रस्थितः प्राप्तुमन्तकम् ॥ १०९॥ दुर्णयाभिमुखो मूर्खश्वालयित्वाऽखिलामिलाम् । षडङ्गेन बलेनासौ प्राप्य तावुदयोन्मुखौ ॥११॥ समुल्लडितमर्यादः कालान्तजलधि जयन् । अरुणहारुणस्तूर्ण पुरं स्वबलवेलया ॥११॥ बालवद्धलया वेलां तत्सेनां निजसेनया। न्यरौत्सीजलनिःसारामचलोऽप्यचलस्थितिः ॥१२॥ द्विपृष्ठो मत्तमातङ्ग सिंहपोत इवोद्धतः । 'पराक्रमैकसाहाय्यादाक्रमद् बलिनं द्विषम् ॥ ११३॥ तारकोऽपि चिरं युद्ध्वा तं निराकर्तुमक्षमः । श्रामयित्वाऽक्षिपञ्चक्रं यमचक्रमिवात्मनः ॥ ११४॥ तत्परीत्य स्थित बाहौ दक्षिणे दयितश्रियः । तस्यासौ तेन चक्रेण नरकं तमजीगमत् ॥ ११५ ॥ द्विपृष्ठः सससद्रत्नस्त्रिखण्डेशस्तदाभवत् । अचलो बलदेवोऽभूत्प्राप्तरत्नचतुष्टयः ॥ ११६॥ कृत्वा दिग्विजय जित्वा प्रतीपाख्यातभूभृतः । नत्वा श्रीवासुपूज्येश प्रविश्य पुरमात्मनः ॥ ११ ॥ चिरं त्रिखण्डसाम्राज्यं विधाय विविधैः सुखैः । द्विपृष्ठः कालनिष्ठायामवधिष्ठानमाश्रितः ॥ ११८ ॥ अचलोऽपि तदुद्वेगाद्वासुपूज्यजिनाश्रयात् । सम्प्राप्य संयम मोक्षलक्ष्म्या सङ्गममीयिवान् ॥ ११९॥ वसन्ततिलका पुण्यैकबीजमवलम्ब्य महीमिवाप्य लब्धोदयौ सममुपार्जितसत्स्वरूपौ। एकोऽगमत् फलितुमकुरवत् किलोवं पापी परो विफलमूलसमस्त्वधस्तात् ॥ १२० ॥ लिए वह हाथी तथा अन्य वस्तुएँ देंगे जिससे कि वे स्वस्थता-कुशलता ( पक्षमें स्वः स्वर्गे तिष्ठतीति स्वस्थः 'शर्परि खरि विसर्गलोपो वा वक्तव्यः' इति वार्तिकेन सकारस्य लोपः। स्वस्थस्य भावः स्वास्थ्यम्) मृत्युको प्राप्त कर सकेंगे। १०६॥ इस प्रकार गम्भीर वचन कह कर अचल बलभद्रने उस दूतको विदा कर दिया और उसने भी जाकर हवाकी तरह उसकी कोपाग्निको प्रदीप्त कर दिया ॥१०७॥ यह सुनकर कोपाग्निसे प्रदीप्त हुआ तारक अग्निके समान प्रज्वलित हो गया और कहने लगा कि.इस प्रकार वे दोनों भाई मेरी क्रोधानिके पतंगे बन रहे हैं॥१०८।। उसने मंत्रियोंके साथ बैठकर किसी कार्यका विचार नहीं किया और अपने आपको सर्वशक्ति-सम्पन्न मान कर मृत्यु प्राप्त करनेके लिए प्रस्थान कर दिया ॥ १०६ ।। अन्याय करनेके सम्मुख हुआ वह मूर्ख षडङ्ग सेनासे समस्त पृथिवीको कॅपाता हुआ उदय होनेके सम्मुख हुए उन दोनों भाइयोंके पास जा पहुँचा। उसने सब मर्यादाका उलंघन कर दिया था इसलिए प्रलयकालके समुद्रको भी जीत रहा था। इस प्रकार अतिशय दुष्ट तारकने शीघ्र ही जाकर अपनी सेनारूपी वेला (ज्वारभाटा) के द्वारा अचल और द्विपृष्ठके नगरको घेर लिया ।। ११०-१११ ॥ जिस प्रकार कोई पर्वत जलकी लहरको अनायास ही रोक देता है उसी प्रकार पर्वतके समान स्थिर रहनेवाले प्रचलने अपनी सेनाके द्वारा उसकी निःसार सेनाको अनायास ही रोक दिया था ॥ ११२॥ जिस प्रकार सिंहका बच्चा मत्त हाथीके ऊपर आक्रमण करता है उसी प्रकार उद्धत प्रकृतिवाले द्विपृष्ठने भी एक पराक्रमकी सहायतासे ही बलवान् शत्रु पर आक्रमण कर दिया ॥११३ ॥ तारकने यद्यपि चिरकाल तक युद्ध किया पर तो भी वह द्विपृष्ठको पराजित करनेमें समर्थ नहीं हो सका। अन्तमें उसने यमराजके चक्रके समान अपना चक्र घुमाकर फेंका ॥ ११४॥ वह चक्र द्विपृष्ठकी प्रदक्षिणा देकर उस लक्ष्मीपतिकी दाहिनी भुजा पर स्थिर हो गया और उसने उसी चक्रसे तारकको नरक भेज दिया ।। ११५॥ उसी समय द्विपृष्ठ, सात उत्तम रत्नोंका तथा तीन खण्ड पृथिवीका स्वामी हो गया और अचल बलभद्र बन गया तथा चार रन उसे प्राप्त हो गये ।। ११६॥ दोनों भाइयोंने शत्रु राजाओंको जीतकर दिग्विजय किया और श्री वासुपूज्य स्वामीको नमस्कार कर अपने नगरमें प्रवेश किया॥ ११७ ॥ चिरकाल तक तीन खण्डका राज्य कर अनेक सुख भोगे। आयुके अन्तमें मरकर द्विपृष्ठ सातवें नरक गया ॥११८॥ भाईके वियोगसे अचलको बहुत शोक हुआ जिससे उसने श्रीवासुपूज्य स्वामीका आश्रय लेकर संयम धारण कर लिया तथा मोक्ष-लक्ष्मीके साथ समागम प्राप्त किया ॥ ११॥ उन दोनों भाइयोंने १ पराक्रमैकसाहाय्यमाक्रमद् ग० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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