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________________ ६८ महापुराणम् रुद्ध्वा माल्यवतीतीरवनं वन्पेभसडकुलम । याबुनं च पयः पीत्वा जिग्घुरस्य द्विपा दिशः ॥५६॥ अनुवणुमतीतीरं गत्वास्य जयसाधनम् । वत्सभूमि समाक्रम्य शामिप्यलडघयत् ॥६०॥ विशालां नालिका सिन्धुं परां निष्कुन्दरीमपि । बहुवजां च रम्यां च नदी सिफतिनीमपि ॥६१॥ ऊहां च समतोयां च कब्जामपि कपीवतीम् । निविन्ध्यां च धुनी जम्बूमती च सरिदुत्तमाम् ॥६२॥ वसुमत्यापगामब्धिगामिनी शर्करावतीम् । सिप्रा च कृतमालां च परिजां पनसामपि ॥६३॥ नदीमवन्तिकामां च हस्तिपानी च निम्नगाम् । कागन्धुमापगां' व्याधीं धुनों चर्मण्वतीमपि ॥६४॥ शतभोगां च नन्दां च नदीं करभवे गिनीम् । चुल्लितापी च रेवां च सप्तपारां च कौशिकीम् ॥६॥ सरितोऽमूरगाधापा विब्वगारुद्ध्य तबलम् । तुरङगमखुरोत्खाततीरा विस्तारिणीयं धात् ॥६६॥ तरश्चिकं गिरि क्रान्त्वा रुद्ध्वा वैडूर्यभूधरम् । भटाः कूटाद्रिमुल्लङघय पारियात्रमशिश्रियन् ॥६७॥ गत्वा पुष्पगिरः प्रस्थान सानन सितगिरेरपि । गदागिरेनिकजेष' बलान्यस्य विशश्रमः ॥६॥ वातपृष्ठदरीभागा नक्षवत् कुक्षिभिः५१ समम् । तत्सैनिकाः श्रयन्ति स्म कम्बलाद्रितटान्यपि ॥६६॥ वासवन्तं महाशैलं विलडघयासुरवूपने २ । स्थित्वाऽस्य सैनिकाः प्रापन मदेभानङगरेयिकान्१३ ॥७०॥ निःसपत्नमिति नमुः इतश्चेतश्च सैनिकाः। द्विपान् वनविभागेषु कर्षन्तोऽस्य निर्गजः ॥७१॥ दुस्तराः सुतरा जाताः सम्भुक्ताः सरितो बलः। स्वारोहाइच दुरारोहा गिरयः क्षुण्णसानवः ॥७२॥ वती नदीको प्राप्त हुए थे ।।५८।। जंगली हाथियोंसे भरे हुए माल्यवती नदीके किनारेके वनको घेरकर तथा यमुना नदीका पानी पीकर भरतके हाथियोंने उस ओरकी समस्त दिशाएं जीत ली थीं ॥५९।। उनकी विजयी सेनाने वेणुमती नदीके किनारे किनारे जाकर वत्स देशकी भूभिपर आक्रमण किया और फिर दशार्णा (धसान) नदीको भी उल्लंघन किया--पार किया ॥६०॥ भरतकी सेनाने विशाला, नालिका, सिन्धु, पारा, निकुन्दरी, बहुवजा, रम्या, सिकतिनी, कुहा, समतोया, कंजा, कपीवती, निविन्ध्या, नदियोंमें श्रेष्ठ जम्मती, वसुमती, समुद्र तक जानेवाली शर्करावती, शिप्रा, कृतमाला, परिजा, पनसा, अवन्तिकामा, हरितपानी, कागंधुनी, व्याधी, चर्मण्वती, शतभागा, नन्दा, करभवेगिनी, चुल्लितापी, रेवा, सप्तपारा, और कौशिकी इन अगाध जलसे भरी हुई नदियोंको चारों ओरसे घेरकर जिनके किनारे घोड़ोंके खुरोंसे खुद गये हैं ऐसी उन नदियोंको बहुत चौड़ा कर दिया था ।।६१-६६।। सैनिकोंने तैरश्चिक नामके पर्वतको लांघकर वैडूर्य नामका पर्वत जा घेरा और फिर कुटाचलको उल्लंघन कर पारियात्र नामका पर्वत प्राप्त किया ||६७॥ भरतकी वह सेना पुष्प गिरिके शिखरोंपर चढ़कर स्मितगिरिके शिखरोंपर जा चढ़ी और फिर वहांसे चलकर उसने गदा नामक पर्वतके लतागृहोंमें विश्राम किया ॥६८॥ भरतके सैनिकोंने ऋक्षवान् पर्वतकी गफाओंके साथ साथ वातपृष्ठ पर्वतकी गुफाओंका आश्रय लिया और फिर वहांसे चलकर कम्बल नामक पर्वतके किनारोंपर आश्रय प्राप्त किया ॥६९॥ वे सैनिक वासवन्त नाभके महापर्वत को उल्लंघन कर असुरधूपन नामक पर्वतपर ठहरे और फिर वहांसे चलकर मदेभ तथा अंगिरेयिक पर्वतपर जा पहुंचे ।।७०।। सेनाके लोग उन देशोंको शत्रुरहित समझकर अपने हाथियों के द्वारा बनके प्रदेशोंमें हाथी पकड़ते हुए जहां तहां घूम रहे थे ।।७१॥ जो नदियां दुस्तर अर्थात् कठिनाईसे तैरने योग्य थीं वे ही नदियां सैनिकोंके द्वारा उपभुक्त होनेपर सुतर अर्थात् सुखसे १ बलम् । २ दशार्णान्' इत्यपि क्वचित् । ३ कुहां ल०। ४ कामधुन्यापगाम् । ५ सानून् । ६ स्मितगिरे-ल० । ७ नितम्बेषु । ८ विश्रमन्ति स्म । ६ वातपृष्ठगिरिकन्दरप्रदेशान् । १० भल्लूका इव । ११ तद्धीरस्थितगुहाभिः सह इत्यर्थः । १२ असुरधूपन इति पर्वतविशेषे। १३ मदेभश्च आनङगश्च रेयिकश्च तान् । १४ स्वीकुर्वन्तः । १५ सुखारोहाः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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