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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व शार्दूलविक्रीडितम् तत्रोद्घोषितमङगलैर्जयजयेत्यानन्दितो वन्दिभिः गत्वातः शिबिरं नपालयमहाद्वारं समासादयन् । 'अन्तर्वशिकलोकवारवनितादत्ताक्षताशासनः२ प्राविक्षनिजकेतनं निधिपतिर्वातोल्लसत्केतनम् ॥२०६॥ वसन्ततिलका देवोऽयमक्षततनुविजिताब्धिरागात् ते यूयमानयत साक्षतसिद्धशेषाः । प्राशीध्वमाध्यमिह सम्मुखमेत्य तूर्णम् इत्युत्थितः कलकलः कटके तदाभूत् ॥२१०॥ जीवेति नन्दतु भवानिति धिषीष्ठाः देवेति निर्जयरिपनिति गां जयेति । त्वं स्ताच्चिरायुरिति कामितमान हीति पुण्याशिषां शतमलम्भि तदा स वृद्धः ॥२१॥ जीयादरीनिह भवानिति निजितारिः देव प्रशाधि वसुधामिति सिद्धरत्नः।। त्वं जीवताच्चिरमिति प्रथमं चिरायः प्रायोजि मङगलधिया पुनरुक्तवाक्यैः ॥२१२॥ देवोऽयमम्बुधिमगाधमलङघयपारम् उल्लङघय लब्धविजयः पुनरप्युपायात्। पुण्य कसारथिरिहेति विनान्तरायः पुण्य प्रसेदुषि नणां किमिवास्त्यलङघयम् ॥२१३॥ रहे हैं ऐसा वह भरत अपनी छावनीके बाहरवाली तोरणभूमिपर आ पहुंचा ॥२०८॥ वहां पर जय जय इस प्रकार मंगलशब्द करते हुए बन्दीजन जिन्हें आनन्दित कर रहे हैं ऐसे वे महाराज भरत छावनीके भीतर जाकर राजभवनके बड़े द्वारपर जा पहुंचे वहां परिवारके लोगों तथा वेश्याओंने उन्हें मंगलाक्षत तथा आशीर्वाद दिये । इस प्रकार निधियोंके स्वामी भरतने जिसपर वायु के द्वारा ध्वजाएं फहरा रही हैं ऐसे अपने तम्बूमें प्रवेश किया ॥२०९॥ जिन्होंने शरीर ट लगे बिना ही समुद्रको जीत लिया है ऐसे ये भरत महाराज आ गये हैं, इसलिये तुम मंगलाक्षत सहित सिद्ध तथा शेषाक्षत लाओ, तुम आशीर्वाद दो और तुम बहुत शीघ्र सामने जाकर खड़े होओ इस प्रकार उस समय सेनामें बड़ा भारी कोलाहल उठ रहा था ॥२१०॥ हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें, समृद्धिमान् हों, सदा बढ़ते रहें, आप शत्रुओंको जीतिये, पृथिवीको जीतिये, आप चिरायु रहिये और समस्त मनोरथोंको प्राप्त कीजिये-आपकी सब इच्छाएं पूर्ण हों इस प्रकार उस समय वृद्ध मनुष्योंने भरत महाराजके लिये सैकड़ों पवित्र आशीर्वाद प्राप्त कराये थे ॥२११॥ यद्यपि भरतेश्वर शत्रुओंको पहले ही जीत चुके थे तथापि उस समय उन्हें आशीर्वाद दिया गया था कि देव, आप शत्रओंको जीतिये, यद्यपि उन्होंने चौदह रत्नोंको पहले ही प्राप्त कर लिया था तथापि उन्हें आशीर्वाद मिला था कि हे देव ! आप पृथिवीका शासन कीजिये, और इसी प्रकार वे पहले हीसे चिरायु थे तथापि आशीर्वाद में उनसे कहा गया था कि हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें-चिरायु हों। इस प्रकार मंगल समझकर लोगोंने उन्हें पुनरुक्त (कार्य हो चुकनेपर उसी अर्थको सूचित करनेके लिये फिरसे कहे हुए,) वचनोंसे युक्त किया था ॥२१२॥ एक पुण्य ही जिनका सहायक है ऐसे महाराज भरत अगाध और पाररहित समुद्रको उलंघनकर तथा योग्य उपायसे विजय प्राप्त कर बिना किसी विघ्न-बाधाके यहां वापिस आ गये हैं सो ठीक ही है क्योंकि निर्मल पुण्यके रहते १ कञ्चुकी। 'अन्तर्वशिका अन्तःपुराधिकारिणः।' जनः' इत्यभिधानात् । २ आशीर्वचनः । ३ आशीषं कुरुध्वम् । ७ शासु अनुशिष्टौ लोट् । ८ उपागमत् । ६ प्रसन्न सति । 'अन्तःपुरेष्वधिकृतः स्यादन्तर्वशिको ४ भुवम् । ५ भव । ६ याहि । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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