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________________ ५८ महापुराणम् मालिनी अथ रथपरिवृत्त्यं सारथौ कृच्छ्रकृच्छ्रात् विषमवलन' भुग्नग्रीवमश्वानुत्सौ । धुवति मरुति मन्दं वीचिबेगोपशान्ते शिबिरमभिनिधीनामीशिता सम्प्रतस्थे ॥ २०४ ॥ कथमपि रथचक्रं सारयित्वाम्बुरुद्धम् " प्रवहणकृतकोपान् वाजिनोऽनुप्रसाध्य' । रथमधि जलमब्धौ चोदयामास सूतो जलधिरपि नृपानुव्रज्ययेवोच्चचाल ॥ २०५ ॥ श्रयमयमुदभारो' वारिराशेर्वरूथं स्थगयति रथवेगादेष भिन्नोमिरब्धिः । इति किल तटसद्भिस्तकर्यमाणो रथोऽयं जवनतुरगकृष्ट : १० प्राप पारेसमुद्रम् ॥ २०६॥ शिखरिणी तरङ्गात्यस्तोऽयं २३ समघटितसर्वाङ्गघटनो रथः क्षेमात् प्राप्तो रथचरण" हेतिश्च कुशली । तुरङगा धौताङगा जलधिसलिलै रक्षतखुरा महत्पुण्यं जिष्णोरिति किल जजल्पुस्तटजुषः १५ ॥२०७॥ नृपैर्गङगाद्वारे प्रणतमणिमौयपतकरैः श्रधस्तात्तद्वेद्याः सजयजयघोषे रधिकृतैः १९ । बहिर्द्वारं?" सैन्यैर्युगपदसकृद्घोषितजयः विभुर्दृष्टः प्रापत् स्वशिबिर बहिस्तोरणभुवम् ॥ २०८ ॥ अथानन्तर - जब सारथिने बड़ी कठिनाईसे रथ लौटानेके लिये विषम रूप से घूमनेके कारण गलेको कुछ टेढ़ा कर घोड़ोंको हांका, मन्द मन्द वायु बहने लगा और लहरोंका वेग शान्त हो गया तब निधियोंके स्वामी भरतने छावनीकी ओर प्रस्थान किया || २०४ || पानीसे रुके हुए रथके पहियोंको किसी तरह बाहर निकालकर और बार बार हांकने अथवा बोझ धारण करनेके कारण कुपित हुए घोड़ोंको प्रसन्न कर सारथि समुद्र में जलके भीतर ही रथ चला रहा था, और वह समुद्र भी उस रथके पीछे पीछे जानेके लिये ही मानो उछल रहा था ॥ २०५ ॥ अरे, यह समुद्रकी बड़ी भारी लहर रथकी छतरीको अवश्य ही ढक लेगी और इधर रथके वेग से समुद्र की लहरें भी फट गई हैं इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग जिसके विषय में अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क कर रहे हैं ऐसा वह वेगशाली घोड़ोंसे खींचा हुआ रथ समुद्र के किनारे पर आ पहुंचा || २०६ || जिसके समस्त अंगोंकी रचना एक समान सुन्दर है ऐसा यह रथ लहरों को उल्लंघन करता हुआ कुशलतापूर्वक किनारे तक आ गया है, चक्ररत्नको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरत भी सकुशल आ गये हैं और समुद्रके जलसे जिनके समस्त अंग धुल गये हैं तथा जिनके खुर भी नहीं घिसे हैं ऐसे घोड़े भी राजी खुशी आ पहुंचे हैं । अहा ! विजयी चक्रवर्तीका बड़ा भारी पुण्य है, इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग परस्परमें वार्तालाप कर रहे थे । ॥२०७॥ जो वेदी के नीचे गङ्गाद्वारपर नियुक्त किये गये हैं, जिन्होंने नवाये हुए मणिमय मुकुटों पर अपने अपने हाथ जोड़कर रखे हैं और जो जय जय शब्दका उच्चारण कर रहे हैं ऐसे राजा लोग, तथा दरवाजेके बाहर एक साथ बार बार जयघोष करनेवाले सैनिक लोग जिसे देख १ परिवर्तनाय | २ विषमाकर्षणकुटिलग्रीवं यथा भवति तथा । ३ प्रेरितमिच्छौ सति । ६ तीरस्थैः । द्वितीयातत्पुरुषः । १५ तटसेविनः । ४ गमयित्वा । ५ प्रेरण । ६ प्रसादं नीत्वा । ७ अनुगमनेन । ८ जलसमूहः । १० वेगाश्वाकृष्ट: । ११ समुद्रस्य पारम् । १२ तरङ्गान् त्यस्तः तरङ्गात्यस्तः इति वररुचिना तथैवोक्तत्वात् । १३ समानं यथा भवति तथा घटित । १४ चक्रायुधः । तीरस्था इत्यर्थः । १६ अधिकारिभिः । १७ द्वारस्य बाह्ये | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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