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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व ससत्त्वमतिगम्भीर भोगिभिर्धतवेलकम् । स राजानमिवात्युच्चः वृत्ति मर्यादया धृतम् ॥१॥ अनेकमन्तरद्वीपमन्तर्वतिनमात्मनः । दुर्गदेशमिवाहार्य पालयन्तमलङघनैः ॥२॥ गर्जभिरतिगम्भीर नभोव्यापिभिरूजितैः । आपूर्यमाणमम्भोभिः घनौधैः किडकरैरिव ॥३॥ 'रअगितैश्चलितः क्षोभैः उत्थितैश्च विवर्तनः । ग्रहाविष्टमिवोज्जम्भं सध्यानं च सणितम् ॥१४॥ रत्नांशुचित्रिततलं मुक्ताशबलितार्णसम् । ग्राहरध्यासितं विष्वक्सुखालोकं च भीषणम् ॥६५॥ नदीनं रत्नभूधिष्ठम् अप्प्राणं चिरजीवितम् । समुद्रमपि चोन्मुद्र० झषके'तुमसन्मथम् ॥६६॥ पर भी संतुष्ट नहीं होता था, जिस प्रकार दुष्ट राजा जल (जड़) अर्थात् मूर्ख मनुष्योंसे घिरा रहता है उसी प्रकार वह समद्र भी निरन्तर जल अर्थात पानीसे घिरा रहता था, और जिस प्रकार दुष्ट राजा गुरु अर्थात् पूज्य महापुरुषोंका तिरस्कार करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी गुरु अर्थात् भारी वजनदार पदार्थोका तिरस्कार करता रहता था अर्थात् उन्हें डुबोता रहता था। अथवा वह समुद्र किसी उत्तम राजाक समान जान पड़ता था क्योकि जिस प्रकार उत्तम राजा सत्त्व अर्थात पराक्रमसे सहित होता है उसी प्रकार वह समद्र भी सत्त्व अर्थात जल-जन्तुओं से सहित था, जिस प्रकार उत्तम राजा अत्यन्त गंभीर होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अत्यन्त गंभीर अर्थात् गहरा था, जिस प्रकार उत्तम राजाके समीप अनेक भोगी अर्थात् राजा लोग विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार उस समद्रकी बला (तट) पर भी अनेक भोगी अर्थात सर्प विद्यमान रहते थे, जिस प्रकार उत्तम राजाकी वृत्ति उच्च होती है उसी प्रकार उस समुद्रकी वृत्ति भी उच्च थी अर्थात् उसका जल हवासे ऊंचा उठ रहा था और जिस प्रकार उत्तम राजा मर्यादा अर्थात् कूल-परम्परास आईहुई समीचीन पद्धतिस सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी मर्यादा अर्थात् पालीसे सहित था। वह समुद्र अपने मध्यम रहनेवाले अनेक अन्तर्वीपोंकी रक्षा कर रहा था वे अन्तर्वीप उसके अलंघनीय तथा हरण करनेके अयोग्य किलोंके समान जान पडते थे। वह अतिशय गम्भीर समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो सेवकोंके समान निरन्तर बढ़ते जते हुए और आकाशमें फैले हुए मेघोंके द्वारा ही जलसे भरा गया हो अथवा वह समुद्र किसी ग्रहाविष्ट अर्थात् भूत लगे हुए मनुष्यके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य जमीनपर रेंगता है, चलता है, क्षुब्ध होता है, ऊंचा उछलता है और इधर उधर घूमता है अथवा करवटें बदलता है उसी प्रकार वह समुद्र भी लहरोंसे पृथिवीपर रेंग रहा था, चल रहा था, क्षुब्ध था, ऊंचा उछलता और इधर उधर घूमता था अर्थात् कभी इधर लहरता था तो कभी उधर लहरता था, तथा ग्रहाविष्ट मनुष्य जिस प्रकार उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई जमुहाइयोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई लहरोंसे सहित था, जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य शब्द करता है उसी प्रकार समुद्र भी शब्द कर रहा था और जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य कांपता रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी वायुसे कांपता रहता था। उस समुद्रका तल भाग रत्नोंकी किरणोंसे चित्र-विचित्र हो रहा था, उसका जल मोतियोंसे चित्रित था, और वह चारों ओर मगरमच्छोंसे भरा हुआ था इसलिये वह देखने में अच्छा भी लगता था और भयानक भी मालूम होता था। वह समुद्र अनेक रत्नों १ भूप्रसर्पणः । २ चलनः । ३ उत्थानः। ४ भ्रमणः । ५ उज्ज़म्भणम् । पक्षे जम्भिकासहितम् । ६ सरित्पतिम् । निस्वसदृशम् । 'नभावे निषेधे च स्वरूपार्थे व्यतिक्रमे। ईषदर्थे च सादृश्ये तद्विरुद्धतदन्ययोः ॥' इत्यभिधानात् । ७ आपः प्राणं यस्य स तम् । पक्षे गतप्राणम् । ८ चिरकालस्थायिनम् । -जीविनम् अ०प०,ब०स०,इ० । ६ मुद्रया सहितम् । १० मुद्रारहितम् । महान्तमित्यर्थः । ११ झषाअकितम् । १२ मत् मनो मथ्नातीति मन्मथः न मन्मथः अमन्मथस्तं मनोहरमित्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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