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________________ षट्चत्वारिंशत्तमं पर्व दातुं समुद्रदत्तस्य निःशक्तेरातप कुधा । परिर्वाद्धतदुर्गन्धधूमान्तर्व तिनश्चिरम् ॥२७६॥ निरोधमभयोद्धो' षणायामानन्ददेशनात् । श्रडगकस्य नृपोरभ्रघातिनः करखण्डनम् ॥ २८० ॥ श्रानन्दराजपुत्रस्य तद्भुक्त्याऽवस्कराशनम्' । मद्यविक्रयणे' बालं कञ्चिदाभरणेच्छ्या ॥२८१॥ हत्वा भूमौ विनिक्षिप्तवत्यास्तत्संविधानकम् । प्रकाशितवती स्वात्मजे शुण्डायाश्च' निग्रहम् ॥ २८२॥ पापान्येतानि कर्माणि पश्यन् हिंसादिदोषतः । श्रत्रामुत्र च पापस्य परिपाकं दुरुत्तरम् ॥२८३॥ श्रवधार्यानभिप्रेतव्रतत्यागो' भवाद् भयात् । "भ्रेषमोष मृषायोषाश्लेष हिंसादिदूषिताः ॥ २८४ ॥ नात्रैव किन्त्वमुत्राऽपि ततश्चित्रवधोचिताः । श्रस्माकमपि दौर्गत्यं प्राक्तनात् पापकर्मणः ॥ २८५ ॥ इदं तस्मात् समुच्चेयं पुष्पं सच्चेष्टितैः पुरु । इति तं मोचयित्वाऽग्रहीषं दीक्षां मुमुक्षया ॥२८६॥ सद्यो गुरुप्रसादेन सर्वशास्त्राब्धिपरिंगः । विशुद्धमतिरन्येद्युः समीपे सर्ववेदिनः ॥२८७॥ मद्दृष्टपूर्वजन्मानि समश्रौषं यथाश्रुतम् । कथयिष्याम्यहं तानि कर्तुं वां" कौतुकं महत् ॥२८८॥ इहैव पुष्कलावत्यां विषये पुण्डरीकिणीम् । परिपालयति प्रीत्या वसुपालमहीभुजि ॥ २८६॥ विद्युद्वेगा ह्वयं चोरम् श्रवष्टभ्य "करस्थितम् । धनं स्वीकृत्य शेषं च भवता दीयतामिति ॥ २६० ॥ ર दी जा रही है और वह विलाप कर रहा है । आगे जानेपर देखा कि सागरदत्तने जुआमें समुद्रदत्तका बहुत सा धन जीत लिया था परन्तु समुद्रदत्त देने में असमर्थ था इसलिये उसने क्रोधसे उसे बहुत देर तक दुर्गन्धित धुआंके बीच धूपमें बैठाल रखा है, किसी जगह देखा कि आनन्द महाराजके अभय घोषणा कराये जानेपर भी उनके पुत्र अंगकने राजाका मेढ़ा मारकर खा लिया है इसलिये उसके हाथ काटकर उसे विष्ठा खिलाया जा रहा है और अन्य स्थानपर देखा कि मद्य पीनेवाली स्त्रीने मद्य खरीदनेके लिये आभूषण लेनेकी इच्छासे किसी बालकको मारकर जमीनमें गाड़ दिया था, वह यह समाचार अपने पुत्रसे कह रही थी कि किसी राज कर्मचारीने उसे सुन लिया इसलिये उसे दण्ड दिया जा रहा है। हिंसा आदि दोषोंसे उत्पन्न हुए इन पापकार्योंको देखकर मैंने निश्चय किया कि पापका फल इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह बुरा होता है । मैंने संसारके भयसे व्रत छोड़ना उचित नहीं समझा। मैं सोचने लगा कि हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीसेवन आदि दूषित हुए पुरुषोंको इसी जन्म में अनेक प्रकारके वध - बन्धनका दुःख भोगना पड़ता हो सो बात नहीं किन्तु परलोकमें भी वही दुःख भोगने पड़ते हैं, हमारी यह दरिद्रता भी तो पहले के पापकर्मोंसे मिली है, इसलिये सदाचारी पुरुषोंको इस पुण्यका अधिकसे अधिक संचय करना चाहिये यह सोचकर मैंने अपने पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छासे दीक्षा धारण कर ली है ॥२७२-२८६ | | गुरुके प्रसादसे में शीघ्र ही सब शास्त्ररूपी समुद्रका पारगामी हो गया और मेरी बुद्धि भी विशुद्ध हो गई । किसी अन्य दिन मैंने सर्वज्ञ देवके समीप दोषोंसे भरे हुए अपने पूर्वजन्म सुने थे सो उसीके अनुसार आप लोगोंका बड़ा भारी कौतुक करनेके लिये उन्हें कहता हूं । २८७ - २८८ । इसी पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकिणी नगरीको राजा वसुपाल बड़े प्रेमसे पालन करते थे || २८९ || किसी एक दिन कोतवालने विद्यद्वेग नामका चोर पकड़ा, उसके हाथमें जो धन था उसे लेकर कहा कि बाकीका धन और दो, धन न देनेपर रक्षकोंने उसे दण्ड दिया तब उसने १ घोषणायां सत्याम् । २ आनन्दाख्यनृपस्य निदेशनात् । ३ एलक (एडक) घातकस्य । ४ तद्भुक्त्वाइत्यपि पाठः । ५ गूथभक्षणम् । ६ मद्यव्यवहारनिमित्तम् । ७ बालघातिन्याः सुते । ८ मद्यपायिन्याः । ६ अनिष्टो व्रतत्यागो यस्य अननुमतव्रतत्याग इत्यर्थः । १० हिंसाचीर्यानृतभाषाब्रह्मबहुपरिग्रहः । रोषमोषमृषायोषाहिंसादिश्लेषादि . . . ल० । ११ दारिद्र्यम् । १२ मोक्तुमिच्छया । १३ सर्वज्ञस्य । १४ शृणोमि स्म । १५ य वयोः । १६ रक्षति सति । १७ बलात्कारेण गृहीत्वा । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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