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________________ महापुराणम् तच्श्रुत्वा पुनरप्याभ्यां भवता केन हेतुना। प्रव्रज्येत्यनयुक्तोऽसौ वक्तुं 'प्रकान्तवान् मुनिः ॥२६७॥ विदेहे पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी। तत्राहं भीमनामाऽऽसं स्वपापाद् दुर्गते' कुले ॥२६॥ अन्येद्यर्यतिमासाद्य किञ्चित्कालादिलब्धितः । श्रुत्वा धर्म ततो लेभे गहिमूलगुणाष्टकम् ॥२६॥ तज्ज्ञात्वा मत्पिता पुत्र किमेभिर्दुष्करैथा। दारिद्यकर्दमालिप्तदेहानां निष्फलैरिह ॥२७०॥ व्रतान्येतानि दास्यामस्तस्मै स्वर्लोककाङक्षिणे। ऐहिकं फलमिच्छामो भवेद्येनेह जीविका ॥२७॥ व्रतं दत्तवतः स्थानं तस्य मे दर्शयत्यसौ । मामवादीद् गृहीत्वैनम् आव्रजन्नहमन्तरे ॥२७२॥ वजकेतोर्महावीथ्यां देवतागृहकक्कुटम् । भास्वत्किरणसंशोष्यमाणधान्योपयोगिनम् ॥२७३॥ पुंसो हतवतो दण्डं जिनदेवापितं धनम् । लोभादपह्न वानस्य धनदेवस्य दुर्मतेः ॥२७४॥ रसनोत्पाटनं हारम् अनय॑मणिनिमितम् । श्रेष्ठिनः प्राप्य चौरं ण गणिकाय समर्पणात् ॥२७॥ रतिपिङगलसंज्ञस्य शूले तलवरार्पणम् । निशि मातुः कनीयस्याः कामनिर्लुप्तसंविदः" ॥२७६॥ पुत्र्या गेहं गतस्याङगच्छेदन पुररक्षिणः । क्षेत्रलोभान्निजे ज्ये ठे मते दण्डहते सति ॥२७७॥ लोलस्यान्वर्थसंज्ञस्य विलापं देशनिर्गमे । द्यूते सागरदत्तन प्रभते निजिते धने ॥२७८॥ सबका भी यथार्थ प्रतिपादन किया ॥२६५-२६६।। यह सुनकर उन देव-देवियोंने फिर पूछा कि आपने किस कारणसे दीक्षा धारण की हैं इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिराज कहने लगे ॥२६७॥ '.. विदेहक्षेत्रके पुष्कलावती देशमें एक पुण्डरीकिणी नगरी है वहांपर मैं अपने पापोंके कारण एक अत्यन्त दरिद्र कुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरा नाम भीम है ॥२६८।। किसी अन्य दिन थोड़ी सी काललब्धि आदिके निमित्तसे मैं एक मुनिराजके पास पहुंचा और उनसे धर्मश्रवण कर मैंने गृहस्थोंके आठ मूल गुण धारण किये ॥२६९॥ जब हमारे पिताको इस बातका पता चला तब वे कहने लगे कि 'दरिद्रतारूपी कीचड़से जिनका समस्त शरीर लिप्त हो रहा है ऐसे हम लोगोंको इन व्यर्थक कठिन व्रतोंसे क्या प्रयोजन है। इनका फल इस लोकमें तो मिलता नहीं है, इसलिये आओ, ये व्रत स्वर्गलोककी इच्छा करनेवाले उसी मुनिके लिये दे आवें। हम तो इस लोकसम्बन्धी फल चाहते हैं जिससे कि जीविका चल सके ॥२७०-२७१॥ व्रत देनेवाले गुरुका स्थान मुझे दिखा" ऐसा मेरे पिताने मुझसे कहा तब मैं उन्हें साथ लेकर चला। रास्तेमें मैंने देखा कि वज्रकेतु नामके एक पुरुषको दण्ड दिया जा रहा है। पितासे मैंने उसका कारण पूछा, तब कहने लगे कि यह सूर्य की किरणोंमें अपना अनाज सुखा रहा था और किसी मन्दिरका मुर्गा उसे खा रहा था। इसने उसे इतना मारा कि बेचारा मर गया। इसलिये ही लोग इसे दण्ड दे रहे हैं। आगे चलकर देखा कि जिनदेवके द्वारा रखी हई धरोहरको लोभसे छुपाने वाले दुर्बुद्धि धनदेवकी जीभ उखाड़ी जा रही है। कुछ आगे चलकर देखा कि एक सेठके घरसे बहुमूल्य मणियोंका हार चुराकर वेश्याको देनेके अपराधमें रतिपिङ्गलको कोतवाल शूलीपर चढ़ा रहा है, किसी जगह देखा कि कामवासनासे जिसका सब ज्ञान नष्ट हो गया है ऐसा एक कोतवाल रातमें अपनी माताकी छोटी बहिनकी पुत्रीके घर गया था इसलिये राज्यकर्मचारी उसका अंग काट रहे हैं। दूसरी जगह देखा कि सार्थक नाम धारण करनेवाले एक लोल नामके किसानने खेतके लोभसे अपने बड़े लड़केको डण्डोंसे मार मारकर मार डाला है, इसलिये उसे देशनिकालेकी सजा १ देवदेवीभ्याम् । २ पृष्टः। ३ प्रारभते स्म । ४ अभूवम् । ५ दरिद्रे कुले। ६ अस्माकम् । ७ पितरम् । ८ अदन्तम् । भक्षयन्तमित्यर्थः । ६ जिनदेवाख्यन दत्तम् । १० वञ्चयतः । ११ निरस्तज्ञानस्य । १२ तलवरस्य। १३ लोलेन हते। १४ लोल इति नाम्नः । १५ परिदेवनम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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