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________________ ३६८ महापुराणम् मुगाडाकस्य कलडाकोऽयं मन्येऽहं कन्ययाऽनया। स्वकान्त्या निजितस्याभूद् रोगराजश्च चिन्तया॥१६॥ साधं कुवलयनन्दुः सह लक्षम्या सरोरुहम् । तद्वक्त्रेण जितं व्यक्तं किमन्यन्नेह जीयते ॥१६॥ जलाब्जं जलवासेन स्थलाब्जं सूर्यरश्मिभिः । प्राप्तुं तद्वक्त्रजां शोभां मन्येऽद्यापि तपस्यति ॥१७०॥ शनैर्बालेन्दुरेखेव सा कलाभिरवर्द्धत । वृद्धास्तस्याः प्रवृद्धाया विधुभिः स्पधिनो' गुणाः ॥१७॥ इति सम्पूर्णसर्वाडगशोभां शुद्धान्ववायजाम् । स्मरो जयभयाद्वैतां न तदाऽप्यकरोत् करे ॥१७२ कारयन्ती जिनेन्द्रा_श्चित्रार मणिमयीहः। तासार हिरण्मयान्येव विश्वोपकरणान्यपि ॥१७३॥ तत्प्रतिष्ठाभिषेकान्ते महापूजाःप्रकुर्वती। मुहः स्तुतिभिराभिः१३ स्तुवती भक्तितोऽर्हतः ॥१७४॥ ददती पात्रदानानि मानयन्ती५ महामुनीन् । शृण्वती धर्ममाकर्ण्य भावयन्ती मुहुर्मुहुः ॥१७॥ प्राप्तागमपदार्थाश्च प्राप्तसम्यक्त्वशुद्धिका । अथ फाल्गुननन्दीश्वरेऽसौ भक्त्या जिनेशिनाम् ॥१७६॥ विधायाष्टाह्निकी पूजाम् अभ्यार्चा यथाविधि । कृतोपवासा तन्वागी शेषां दातुमुपागता ॥१७७॥ नृपं सिंहासनासीनं सोऽप्युत्थाय कृताञ्जलिः । तद्दत्तशेषामादाय" निधाय शिरसि स्वयम् ॥१७॥ लक्ष्मीके साथ साथ कितनी सी स्त्रियोंकी सृष्टि बाकी रही थी ? भावार्थ-इसने लक्ष्मी आदि उत्तम उत्तम स्त्रियोंको जीत लिया था ॥१६७॥ चन्द्रमाके बीच जो यह कलंक दिखता है उसे मैं ऐसा मानता हूँ कि इस कन्याने अपनी कान्तिसे चन्द्रमाको जीत लिया है इसीलिये मानो उसे चिन्ताके कारण क्षयरोग हो गया हो ॥१६८॥ उस सुलोचनाके मुखने चन्द्रमाके साथ कुवलय अर्थात् कुमदको जीत लिया था और लक्ष्मीके साथ साथ कमलको भी जीत लिया था फिर भला इस संसारमें और रह ही क्या जाता है जो उसके मुखके द्वारा जीता न जा सके ॥१६९।। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उसके मुखकी शोभा प्राप्त करनेके लिये जलकमल जलमें रहकर और स्थल कमल सूर्य की किरणोंके द्वारा आजतक तपस्या कर रहा है ।।१७०।। वह सुलोचना द्वितीया चन्द्रमाकी रेखाके समान कलाओंके द्वारा धीरे धीरे बढती थी और ज्यों ज्यों बढ़ती जाती थी त्यों त्यों चन्द्रमाकी कान्तिके साथ स्पर्धा करनेवाले उसके गुण भी बढ़ते जाते थे ॥१७॥ इस प्रकार जो समस्त अंगोंकी शोभासे परिपूर्ण है और शुद्ध वंशमें जिसकी उत्पत्ति हुई है ऐसी उस सुलोचनाको कामदेव जयकुमारके भयसे युवावस्थामें भी अपने हाथमें नहीं कर सका था ॥१७२॥ उस सुलोचनाने श्री जिनेन्द्रदेवकी अनेक प्रकारकी रत्नमयी बहुत सी प्रतिमाएं बनवाई थों और उनके सब उपकरण भी सुवर्ण हीके बनवाये थे। प्रतिष्ठा तथा तत्सम्बन्धी अभिषेक हो जाने के बाद वह उन प्रतिमाओंकी महापूजा करती थी, अर्थपूर्ण स्तुतियोंके द्वारा श्री अर्हन्तदेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति करती थी, पात्र दान देती थी, महामुनियोंका सन्मान करती थी, धर्मको सुनती थी तथा धर्मको सुनकर आप्त आगम और पदार्थोंका बार बार चिन्तवन करती हुई सम्यग्दर्शनकी शुद्धताको प्राप्त करती थी । अथानन्तर-फाल्गुन महीनेकी अष्टाह्निकामें उसने भक्तिपूर्वक श्री जिनेन्द्रदेवकी अष्टाह्निकी पूजा की, विधिपूर्वक प्रतिमाओंकी पूजा की, उपवास किया और फिर वह कृशांगी पूजाके शेषाक्षत देनेके लिये सिंहासनपर बैठे हुए राजा अकम्पनके १ क्षयव्याधिः । २ मनोदुःखेन। ३ तपश्चरति । ४ अवयवैः । ५ विधुभास्पद्धिनो ल०, म०, अ०, ५०, इ०, स० । ६ शुद्धवंशजाताम् । ७ जयकुमारभयादिव । ८ सलोचनाम् । ६ यौवनकालेऽपि । १० करग्रहणं नाकरोत् । तस्याः कामविकारो नाभूदित्यर्थः । ११ प्रतिमाः । १२ प्रतिमानाम् । १३ सदर्थयुक्ताभिः । १४ अहंदेवान्। १५ पूजयन्ती। १६ शेषान् ल०, म०। १७ -नादाय ल०, म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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