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________________ द्विचत्वारिंशत्तम पर्व ३३९ अथवा कर्मनोकर्मगर्भेऽस्य परिवर्तनम । गर्भवासो बिलीनत्वं स्याद् बेहान्तरसङक्रमः ॥२॥ क्षुभितत्वं च संक्षोभः क्रोधाद्याविष्टचेतसः। भवेद विविधयोगोऽस्य नानायोनिषु संक्रमः ॥१२॥ संसारावास एषोऽस्य चतुर्गतिविवर्तनम् । प्रतिजन्मान्यथाभावो ज्ञानादीनामसिद्धता ॥३॥ सुखासुखं बलाहारौ देहावासौ च देहिनाम् । विवर्तन्ते तथा ज्ञानं दृशक्ती च रजोजुषाम् ॥४॥ एवं'प्रायास्तु ये भावाः संसारिष विनश्वराः । मुक्तात्मनां न सन्त्यते भावास्तेषां ह्यनश्वराः ॥६॥ मुक्तात्मनां भवेद् भावः' स्वप्रधानत्वमग्रिमम् । प्रतिलब्धात्मलाभत्वात् परद्रव्यानपेक्षणम् ॥१६॥ वेदनाभिभवाभावाद् अचलत्व गभीरता । स्यादक्षयत्वमक्षय्यं क्षयिकातिशयोदयः ॥७॥ अव्याबाधत्वमस्यष्टं जीवाजीवर"बाध्यता । भवेदनन्तज्ञानत्वं विश्वार्थाक्रमबोधनम् ॥६॥ अनन्तदर्शनत्वं च विश्वतत्त्वा क्रभेक्षणम् । योऽन्यैरप्रतिघातोऽस्य सा मतानन्तवीर्यता Meen भोपेष्वर्थेष्वनौत्सुक्यमनन्तसुखता सता । नीरजस्त्वं भवेदस्य व्यपायः पुण्यपापयोः ॥१०॥ निर्मलत्वं तु तस्येष्टं बहिरन्तर्मलच्युतिः। स्वभावविमलोऽनादिसिद्धो नास्तीह कश्चन ॥१०॥ योऽस्य जीवघनाकारपरिणामों" मलक्षयात् । तदच्छेदत्वमाम्नातम् अभेद्यत्वं च तत्कृतम् ॥१०२॥ प्रक्षरत्वं च मक्तस्य क्षरणाभावतो मतम् । अप्रमेयत्वमात्मोत्थैर्गुणैरबैरमेयता ॥१०३॥ शरीरमें रुका रहता है वह इसका प्रमेयपना है और जो बालक होकर माताके पेट में दुःखसे रहता है वह इसका गर्भवास है ॥९०॥ अथवा कर्म नोकर्मरूपी गर्भमें जो इसका परिवर्तन होता रहता है वह इसका गर्भावास है और एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जो संक्रमण करना है वह विलीनता है ।।९।। क्रोध आदिसे आक्रान्त चित्तमें जो क्षोभ उत्पन्न होता है वह इसका क्षुभितपना है, और नाना योनियों में परिभ्रमण करना इसका विविध योग कहलाता है ॥९२॥ चारों गतियों में परिवर्तन करते रहना इस जीवका संसारावास कहलाता है और प्रत्येक जन्ममें ज्ञानादि गुणोंका अन्य अन्य रूप होते रहना असिद्धता कहलाती है ।।९३।। कर्मरूपी रजसे युक्त रहनेवाले इन संसारी जीवोंके जिस प्रकार सुख दुःख, बल, आहार, शरीर और घर बदलते रहते हैं उसी प्रकार उनके ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य भी बदलते रहते हैं ।।९४।। इस प्रकार संसारी जीवों के जो बिनश्वरभाव हैं वे मुक्त जीवोंके नहीं हैं, उनके सब भाव अविनश्वर हैं ॥९५।। मुक्त जीवों के उन भावोंमें आत्मस्वरूपकी प्राप्ति होने से परद्रव्यकी अपेक्षासे रहित जो सर्व श्रेष्ठ स्वतन्त्रपना है वही पहला भाव है ।।९६॥ सुख दुःख आदिकी वेदनासे होनेवाले परभाव का अभाव होनेसे जो अचञ्चलता होती है वही उनकी गंभीरता है और कर्मोके क्षयसे जो अतिशयोंकी प्राप्ति होती है वही उनका अविनाशी अक्षयपना है ॥९७॥ किसी भी जीव अथवा अजीवसे इन्हें बाधा नहीं पहुंचती यही इनका अव्याबाधपना है और संसारके समस्त एक साथ जानते हैं यही इनका अनन्तज्ञानीपन है ॥९८।। समस्त तत्त्वोंको एक साथ देखना ही इनका अनन्तदर्शनपन है और अन्य पदार्थों के द्वारा प्रतिघातका न होना अनन्तवीर्यपना है ॥९९॥ भोग करने योग्य पदार्थों में उत्कंठा न होना अनन्तसुखपना माना जाता है और पुष्य तथा पापका अभाव हो जाना नीरजसपन कहलाता है ॥१००॥ बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग मलका नाश होना ही इसका निर्मलपना कहलाता है क्योंकि इस संसार में ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है जो स्वभावसे ही निर्मल हो और अनादि कालसे सिद्ध हो ॥१०१॥ कर्मरूपी मलके नाश होनेसे जो जीवके प्रदेशोंका घनाकार परिणमन होता है वही इसका अच्छेद्यपना है और उसी कर्मरूपी मलके नाश होनेसे इसके अभेद्यपना माना जाता है ॥१०२॥ मुक्त जीवका १ दुक च शक्तिश्च दृकुछक्ती । २ कर्मफलभाजाम् । ३ एवमादयः । ४ स्वभावः । ५ चेतनाचेतनः । ६ युगपत् । ७ परिगमनम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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