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________________ २९६ महापुराणम् नमः शब्दपरौ चेतौ चतुर्यन्त्यावनुस्मृतौ । ततो गणधरायति पदं युक्तनमः पवम् ॥४२॥ परषिभ्य इत्यस्मात्परं वाच्यं नमो नमः । ततोऽनुपमजाताय नमो नम इतीरयेत् ॥४३॥ सम्यग्दृष्टिपदं चान्ते बोध्यन्तं द्विरुदाहरेत् । ततो भूपतिशब्दश्च नगरोपपदः पतिः ॥४४॥ द्विर्वाच्यौ ताविमौ शब्दो बोध्यन्तौ मन्त्रवेदिभिः । मन्त्रशेषोऽव्ययं तस्मादनन्तरमुदीर्यताम् ॥४॥ कालश्रमगशब्दं च द्विरुक्त्वाऽऽमन्त्रणे ततः । स्वाहेति पदमच्चार्य प्राग्वत्काम्यानि चोद्धरेत ॥४६॥ चूणिः-सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, निर्ग्रन्थाय नमः, वीतरागाय नमः, महाव्रताय नमः, त्रिगुप्ताय नमः, महायोगाय नमः, विविधयोगाय नमः, विविधर्धये नमः, अडगधराय नमः, पूर्वधराय नमः, गणधराय नमः, परमषिभ्यो नमो नमः, अनुपमजाताय नमो नमः, सम्यग्दष्टे सम्यग्दृष्टे भूपते भूपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमग स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिरणं भवतु । (मनिमन्त्रोऽयमाम्नातो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । वक्ष्ये सुरेन्द्रमन्त्रं च यथा स्माहार्षभी श्रुतिः ॥४७॥ प्रथमं सत्यजाताय स्वाहेत्येतत्पदं पठेत् । ततः स्यादर्हज्जाताय स्वाहेत्येतत्परं पदम् ॥४८॥ धर्द्धये नमः' (अनेक ऋद्धियोंको धारण करनेवालेके लिये नमस्कार हो) ऐसा उच्चारण करना चाहिये । इसी प्रकार जिनके आगे नमः शब्द लगा हुआ है ऐसे चतुर्थ्यन्त अङ्गधर और पूर्वधर शब्दोंका पाठ करना चाहिये अर्थात् 'अङ्गवराय नमः' (अङ्गोंके जाननेवालेको नमस्कार हो) और 'पूर्वधराय नमः' (पूर्वो के जाननेवालोंको नमस्कार हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये । तदनन्तर 'गणधराय नमः' (गणवरको नमस्कार हो) इस पदका उच्चारण करना चाहिये ॥४१-४२।। फिर परमर्षिभ्यः शब्दके आगे नमो नमः का उच्चारण करना चाहिये अर्थात् 'परमर्षिभ्यो नमो नमः' (परम ऋषियोंको बार बार नमस्कार हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये और इसके बाद 'अनुपमजाताय नमो नमः' (उपमारहित जन्मधारण करनेवालेको बार बार नमस्का र हो) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ॥४३॥ फिर अन्तमें सम्बोधन विभक्त्यन्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार उच्चारण करना चाहिये और इसी प्रकार मन्त्रोंको जाननेवाले द्विजों को सम्बोधनान्त भूपति और नगरपति शब्दका भी दो दो बार उच्चारण करना चाहिये । तर आगे कहा जानेवाला मन्त्रका अवशिष्ट अंश भी बोलना चाहिये । कालश्रमण शब्दको सम्बोधन विभक्तिमें दो बार कहकर उसके आगे स्वाहा शब्दका उच्चारण करना चाहिये और फिर यह सब कह चुकने के बाद पहले के समान काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये ॥४४-४६।। इन सब ऋषिमन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है ____ 'सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, निर्ग्रन्याय नमः, वीतरागाय नमः, महाव्रताय नमः, त्रिगुप्ताय नमः, महायोगाय नमः, विविधयोगाय नमः, विविधर्द्धये नमः' अङ्गधराय नमः, पूर्वधराय नमः, गणवराय नमः, परमर्षिभ्यो नमो नमः, अनुपमजाताय नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे भूपते भूपते नगरपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमण स्वाहा, सेवाफलं षट् रमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । तत्त्वोंके जाननेवाले मुनियों के द्वारा ये ऊपर लिखे हुए मन्त्र मुनिमन्त्र अथवा ऋषिमन्त्र माने गये हैं । अब इनके आगे भगवान् ऋषभदेवकी श्रुतिने जिस प्रकार कहा है उसी प्रकार में सुरेन्द्र मन्त्रोंको कहता हूं ॥४७॥ प्रथम ही मैं 'सत्यजाताय स्वाहा' (सत्यजन्म लेनेवालेको हवि समर्पण करता हूं) यह पद पढ़ना चाहिये, फिर 'अर्हज्जाताय स्वाहा' (अरहन्तके योग्य जन्म लेनेवालेको हवि १ वदन्ति स्म । २ ऋषभप्रोक्ता। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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