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________________ २६२ महापुराणम् ततोऽमराप्रमेयोक्ती सागर्भावासशब्दने । ततोऽक्षोभ्यायिलीनोक्ती परमादिर्घनध्वनिः ॥१६॥ पृथक्पृथगिमे शब्दास्त दन्तास्तत्परा मताः। उत्तराण्यनुसन्धाय पवान्येभिः पदैर्वदेत् ॥१७॥ प्रादौ परमकाष्ठति योगरूपायवाक्परम् । नमः शब्दमदीर्यान्ते मन्त्रविन्मन्त्रमुद्धरेत् ॥१८॥ लोकाग्रवासिनशब्दात्परः कार्यो नमो नमः। एवं परमसिद्धेभ्योऽर्हसिद्धेभ्य इत्यपि ॥१६॥ एवं केवलिसिद्धेभ्यः पदाद् भूयोऽन्तकृत्पदात् । सिद्धभ्य इत्यमुष्माच्च परम्परपदादपि ॥२०॥ अनादिपदपूर्वाच्च तस्मादेव' पदात्परस । अनाद्यनुपमादिभ्यः सिद्धेभ्यश्च नमो नमः ॥२१॥ नमः' (कर्मरूपी धूलिसे रहित जिनराजको नमस्कार हो), 'निर्मलाय नमः' (कर्मरूप मलसे रहित जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार हो) 'अच्छेद्याय नमः' (जिनका कोई छेदन नहीं कर सके ऐसे जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो), 'अभेद्याय नमः' (जो किसी तरह भिद नहीं सके ऐसे अरहन्त को नमस्कार हो), 'अजराय नमः' (जो बुढापासे रहित है उसे नमस्कार हो,) 'अमराय नमः' (जो मरणसे रहित है उसे नमस्कार हो), 'अप्रमेयाय नमः' (जो प्रमाणसे रहित है-छद्मस्थ पुरुषके ज्ञानसे अगम्य है, उसे नमस्कार हो) 'अगर्भवासाय नमः' (जो जन्म-मरणसे रहित होने के कारण किसीके गर्भ में निवास नहीं करते ऐसे जिनराजको नमस्कार हो), 'अक्षोभ्याय, नमः' (जिन्हें कोई क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता ऐसे भगवान्को नमस्कार हो), 'अविलीनाय नमः' (जो कभी विलीन-नष्ट नहीं होते उन परमात्माको नमस्कार हो) और 'परमघनाय नमः' (जो उत्कृष्ट धनरूप हैं-उन्हें नमस्कार हो) इन अव्यावाद्य आदि शब्दोंके आगे चतुर्थीविभक्ति तथा नमः शब्द लगाकर ऊपर लिखे अनुसार अव्यावाधाय नमः आदि मन्त्र पदोंका उच्चारण करना चाहिये ॥१४-१७।। तदनन्तर मन्त्रको जाननेवाला द्विज जिसके आदिमें 'परमकाष्ठा है और अन्तमें योगरूपाय है ऐसे शब्दका उच्चारण कर उसके आगे 'नमः' पद लगाता हुआ 'परमकाष्ठयोगाय नमः' (जिनका योग उत्कृष्ट सीमाको प्राप्त हो रहा है ऐसे जिनेन्द्रको नमस्कार हो) इस मन्त्रका उद्धार करे ॥१८॥ फिर लोकाग्रवासिने शब्दके आगे 'नमो नमः' लगाना चाहिये इसी प्रकार परम सिद्धेभ्यः और अर्हत्सिद्धेभ्यः शब्दोंके आगे भी नमो नमः शब्दका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् क्रमसे 'लोकाग्रवासिने नमो नमः' (लोकके अग्रभाग पर निवास करनेवाले सिद्ध परमेष्ठीको बार बार नमस्कार हो), 'परमसिद्धेभ्यो नमो नमः' (परम सिद्धभगवान्को बार बार नमस्कार हो) और 'अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः' (जिन्होंने अरहन्त अवस्थाके बाद सिद्ध अवस्था प्राप्त की है ऐसे सिद्ध महाराजको बार बार नमस्कार हो) इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये ।।१९।। इसी प्रकार 'केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः' (केवली सिद्धोंको नमस्कार हो) 'अन्तःकृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः' (अन्तकृत् केवली होकर सिद्ध होनेवालोंको नमस्कार हो), 'परम्परसिद्धेभ्यो नमः' (परम्परासे हए सिद्धोंको नम 'अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमः' (अनादि कालसे हुए परम सिद्धोंको नमस्कार हो) और 'अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमो नमः' (अनादिकालसे हुए उपमारहित सिद्धोंको नमस्कार हो,) इन मन्त्रपदों का उच्चारण कर नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिये। इन नीचे लिखे शब्दोंको सम्बोधनरूपसे दो दो बार बोलना चाहिये। प्रथम ही हे सम्यग्दृष्टे हे सम्यग्दृष्टे, हे आसन्नभव्य १ अमराप्रमेयशब्दौ । २ सागर्भावासशब्दसहिते। ३ परमघनशब्दः । ४ अव्याबाधपदमित्यादयः । ५ चतुर्थ्यन्ताः । ६ नमःशब्दपराः । ७ परम्परशब्दात् । ८ सिद्धेभ्य इति पदात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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