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________________ चत्वारिंशत्तम पर्व कुर्यादक्षतपूजार्थम् अक्षताय नमः पदम् । (अक्षताय नमः) धूपाचे श्रुतधूपाय नमः पदमुदाहरेत् ॥ (श्रुतधूपाय नमः) ज्ञानोद्योताय पूर्व च दीपदाने नमः पदम्। (ज्ञानोद्योताय नमः) मन्त्रः परमसिद्धाय नमः इत्यामृतोद्धृतौ ॥६॥ (परमसिद्धायनमः) मन्त्ररेभिस्तु संस्कृत्य यथावज्जगतीतलम । ततोऽन्वक पीठिकामन्त्रः पठनीयो द्विजोत्तमैः ॥१०॥ पीठिकामन्त्रः-- सत्यजातपदं पूर्व चतुर्थ्यन्तं नमः परम् । ततोऽर्हज्जातशब्दश्च तदन्तस्तत्परों मतः ॥११॥ ततः परमजाताय नम इत्यपरं पदम् । ततोऽनुपमजाताय नम इत्युत्तरं पदम् ॥१२॥ ततश्च स्वप्रधानाय नम इत्युत्तरो ध्वनिः । अचलाय नमः शब्दाद् अक्षयाय नमः परम् ॥१३॥ अव्याबाधपदं चान्यद् अनन्तज्ञानशब्दनम् । अनन्तदर्शनानन्तवीर्यशब्दौ ततः पृथक् ॥१४॥ अनन्तसुखशब्दश्च नीरजःशब्द एव च । निर्मलाच्छेद्यशब्दौ च तथाऽभेद्याजरश्रुती ॥१५॥ नमः (कर्ममलसे रहित जिनेन्द्रभगवान्के लिये नमस्कार हो) ॥७॥ अक्षतसे पूजा करने के लिये 'अक्षताय नमः' (क्षयरहित जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले और धूपसे पूजा करते समय 'श्रुतधूपाय नमः' (प्रसिद्ध वासनावाले भगवान्को नमस्कार हो) इस मन्त्रका उच्चारण करे ॥८॥ दीप चढ़ाते समय 'ज्ञानोद्योताय नमः' (ज्ञानरूप उद्योत-प्रकाश) को धारण करनेवाले जिनेन्द्रभगवानको नमस्कार हो) यह मन्त्र पढे और अमत अर्थात् नैवेद्य चढ़ाते समय 'परमसिद्धाय नमः' (उकृष्ट सिद्धभगवान्को नमस्कार हो) ऐसा मन्त्र बोले ॥९॥ इस प्रकार इन मन्त्रोंसे विधिपूर्वक भूमिका संस्कार कर उसके बाद उन उत्तम द्विजोंको पीठिका मन्त्र पढ़ना चाहिये ॥१०॥ पीठिका मन्त्र इस प्रकार है-सबसे पहले, जिसके आगे 'नम' शब्द लगा हआ है और चतुर्थी विभक्ति अन्तमें है ऐसे सत्यजात शब्दका उच्चारण करना चाहिये अर्थात् 'सत्यजाताय नमः' (सत्यरूप जन्मको धारण करनेवाले जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) बोलना चाहिये, उसके बाद चतुर्थ्यन्त अर्हज्जात शब्दके आगे 'नमः' पद लगा कर 'अहज्जाताय नमः' (प्रशसनीय जन्मको धारण करनेवाल जिनेन्द्रभगवानको नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले ॥१॥ तदनन्तर 'परमजाताय नमः' (उत्कृष्ट जन्मग्रहण करनेवाले अर्हन्तदेवको नमस्कार हो) बोलना चाहिये और उसके बाद 'अनुपमजाताय नमः' (उपमारहित जन्म धारण करनेवाले जिनेन्द्रको नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।१२।। इसके बाद 'स्वप्रधानाय नमः' (अपने आप ही प्रधान अवस्थाको प्राप्त होनेवाले जिनराजको नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले और उसके पश्चात् 'अचलाय नमः' (स्वरूपमें निश्चल रहनेवाले वीतराग को नमस्कार हो) तथा 'अक्षयाय नमः' (कभी नष्ट न होनेवाले भगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र पढना चाहिये ॥१३॥ इसी प्रकार 'अव्यावाधाय नमः' (बाधाओंसे रहित परमेश्वर को नमस्कार हो), 'अनन्तज्ञानाय नमः' (अनन्त ज्ञानको धारण करनेवाल जिनराजको नमस्कार हो), 'अनन्तदर्शनाय नमः' (अनन्तदर्शन-केवल दर्शनको धारण करनेवाले जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो), 'अनन्तवीर्याय नमः' (अनन्त बलके धारक अर्हन्तदेवको नमस्कार हो), 'अनन्तसुखाय नमः' (अनन्तसुखके भाण्डार जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो), 'नीरजसे १ धूपार्चने । २ चरुसमर्पगे। ३ तस्मात् परम् । ४ चतुर्थ्यन्तः । ५ नमः परः । ६ शब्दः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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