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________________ २८८ महापुराणम् या सुरेन्द्रपदप्राप्तिः पारिवाज्यफलोदयात् । सैषा सुरेन्द्रता नाम क्रिया प्रागनुवर्णिता ॥२०१॥ इति सुरेन्द्रता। साम्राज्यमाधिराज्यं स्याच्चक्ररत्नपुरःसरम् । निधिरत्नसमुद्भूतं भोगसम्पत्परम्परम् ॥२०२॥ इति सामाज्यम् । आर्हन्त्यमहतो भावो कर्म वेति परा क्रिया। यत्र स्वर्गावतारादिमहाकल्याणसम्पदः ॥२०३।। याऽसौ दिवोऽवतीर्णस्य प्राप्तिः कल्याणसम्पदाम् । तदाहन्त्यमिति ज्ञेयं त्रैलोक्यक्षोभकारणम् ॥२०४॥ इत्यार्हन्त्यम् । भवबन्धनमुक्तस्य यावस्था परमात्मनः। परिनिर्वृत्तिरिष्टा सा परं निर्वाणमित्यपि ॥२०॥ कृत्स्नकर्ममलापायात संशद्धिर्याऽन्तरात्मनः । सिद्धिःस्वात्मोपलब्धिः सानाभावो न गुणोच्छिवा ॥२०६॥ इति निर्वतिः। ( इत्यागमानुसारेण प्रोक्ताः कर्बन्वयक्रियाः । सप्तैताः परमस्थानसङगतिर्यत्र योगिनाम् ॥२०७॥ योऽनुतिष्ठत्यतन्द्राल: क्रिया ह्येतास्त्रिघोदिताः। सोऽधिगच्छेत् परं धाम यत्सम्प्राप्तो परं शिवम् ॥२०८॥ पुष्पिताग्रावृत्तम् (जिनमतविहितं पुराणधर्म य इममनुस्मरति क्रियानिबद्धम् । अनुचरति च पुण्यधीः स भव्यो भवभयबन्धनमाशु निर्धनाति ॥२०६॥ को छोड़कर इसी सर्वोत्कृष्ट पारिव्रज्यको ग्रहण करना चाहिये ।।२००॥ यह तीसरी पारिव्रज्य क्रिया है। पारिव्रज्यके फलका उदय होनेसे जो सुरेन्द्र पदकी प्राप्ति होती है वही यह सुरेन्द्रता 'क्रया है इसका वर्णन पहले किया जा चुका है ॥२०१॥ यह चौथी सरेन्द्रता क्रिया है। _ जिसमें चक्ररत्नके साथ साथ निधियों और रत्नोंसे उत्पन्न हुए भोगोपभोगरूपी संपदाओं की परम्परा प्राप्त होती है ऐसा चक्रवर्तीका बड़ा भारी राज्य साम्राज्य कहलाता है ॥२०२॥ यह पाँचवीं साम्राज्यक्रिया है। अर्हत् परमेष्ठीका भाव अथवा कर्मरूप जो उत्कृष्ट क्रिया है उसे आर्हन्त्य क्रिया कहते हैं। इस क्रिया में स्वर्गावतार आदि महाकल्याणकरूप सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है ॥२०३।। स्वर्गसे अवतीर्ण हुए अर्हन्त परमेष्ठीको जो पञ्चकल्याणकरूप सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है उसे आर्हन्त्य क्रिया जानना चाहिये, यह आर्हन्त्यक्रिया तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाली है ॥२०४॥ यह छठवों आर्हन्त्यक्रिया है। संसारके बन्धनसे मुक्त हुए परमात्माकी जो अवस्था होती है उसे परिनिर्वृति कहते हैं । इसका दूसरा नाम परनिर्वाण भी है ।।२०५।। समस्त कर्मरूपी मलके नष्ट हो जानेसे जो अन्तरात्माकी शुद्धि होती है उसे सिद्धि कहते हैं. यह सिद्धि अपने आत्मतत्त्वकी प्राप्तिरूप है अभावरूप नहीं है और न ज्ञान आदि गुणोंके नाशरूप ही है ।।२०६।। यह सातवीं परिनिर्वृति क्रिया है । इस प्रकार आगमके अनुसार ये सात कन्वय क्रियाएं कही गई हैं, इन क्रियाओंका पालन करनेसे योगियोंको परम स्थानकी प्राप्ति होती है ॥२०७।। जो भव्य आलस्य छोड़कर निरूपण की हुई इन तीन प्रकारकी क्रियाओंका अनुष्ठान करता है वह उस परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त होता है जिसके प्राप्त होनेपर उसे उत्कृष्ट सुख मिल जाता है ॥२०८॥ पवित्र बुद्धिको धारण करने ३ 'बुद्धिसुखदुःखादिनवानामात्मगुणानामत्यन्तोच्छि १ फलोदय प० । २ तुच्छाभावरूपो न। त्तिर्मोक्ष' इति मतप्रोक्तो मोक्षो न । ४ सुखम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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