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________________ एकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व स्वगुणोत्कीर्तनं त्यक्त्वा त्यक्तकामो महातपाः । स्तुतिनिन्दासमो भूयः कीर्त्यते भुवनेश्वरैः ॥११॥ वन्दित्वा वन्द्यमर्हन्तं 'यतोऽनुष्ठितवांस्तपः । ततोऽयं वन्द्यते वन्यैः श्रनिन्द्यगुणसन्निधिः ॥ १६२ ॥ तपोऽयमनुपानत्कः पादचारी विवाहनः । कृतवान् पद्मगर्भेषु चरणन्यासमर्हति ॥ १६३॥ गुप्तोहितवाग्वृत्त्या यतोऽयं तपसि स्थितः । ततोऽस्य दिव्यभाषा स्यात् प्रीणयन्त्यखिलां सभाम् ॥ १६४ ॥ अनाश्वान्नियताहारपारणोऽतप्त यत्तपः । तदस्य दिव्य विजय परमामृततृप्तयः ॥१६५॥ त्यक्तकामसुखो भूत्वा तपस्यस्थाच्चिरं यतः । ततोऽयं सुखसाद्भूत्वा परमानन्दथुं भजेत् ॥ १६६॥ किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिष्टं यथाविधम् । त्यजेन्मुनिरसंकल्पः तत्तत्सूतेऽस्य तत्तपः ॥१६७॥ प्राप्तोत्कर्षं तदस्य स्यात्तपश्चिन्तामणेः फलम् । यतोऽर्हज्जातिमूर्त्यादिप्राप्तिः सैषाऽनुवर्णिता ॥ १६८ ॥ जैनेश्वरीं परामाज्ञां सूत्रोद्दिष्टां प्रमाणयन् । तपस्यां यदुपाधत्ते पारिव्राज्यं तदाञ्जसम् ॥१६६॥ श्रन्यच्च बहुवाग्जाले निबद्धं युक्तिबाधितम् । पारिव्राज्य परित्यज्य ग्राह्यं चेदमनुत्तरम् ॥२००॥ इति पारिव्राज्यम् । वह तीनों लोकों की सभा अर्थात् समवसरण भूमिमें विराजमान होता है ॥ १९०॥ जो सब प्रकारकी इच्छाओंका परित्याग कर अपने गुणोंकी प्रशंसा करना छोड़ देता है और महातपश्चरण करता हुआ स्तुति तथा निन्दामें समान भाव रखता है वह तीनों लोकोंके इन्द्रोंके द्वारा प्रशंसित होता है अर्थात् सब लोग उसकी स्तुति करते हैं ॥। १९१ || इस मुनिने वन्दना करने योग्य अर्हन्तदेवकी बन्दना कर तपश्चरण किया था इसीलिये यह वन्दना करने योग्यपूज्य पुरुषोंके द्वारा वन्दना किया जाता है तथा प्रशंसनीय उत्तम गुणोंका भाण्डार हुआ है ।। १९२॥ जो जूता और सवारीका परित्याग कर पैदल चलता हुआ तपश्चरण करता है वह कमलों के मध्यमें चरण रखनेके योग्य होता है अर्थात् अर्हन्त अवस्थामें देवलोग उसके चरणोंके नीचे कमलोंकी रचना करते हैं ॥१९३॥ | चूँकि यह मुनि वचनगुप्तिको धारण कर अथवा हित मित वचनरूप भाषासमितिका पालन कर तपश्चरण में स्थित हुआ था इसलिये ही इसे समस्त सभाको संतुष्ट करनेवाली दिव्य ध्वनि प्राप्त हुई है ।। १९४ ।। इस मुनिने पहले उपवास धारण कर अथवा नियमित आहार और पारणाएं कर तप तपा था इसलिये ही इसे दिव्यतृप्ति, विजयतृप्ति, परमतृप्ति और अमृततृप्ति ये चारों ही तृप्तियाँ प्राप्त हुई हैं ।। १९५ ।। यह मुनि काम जति सुखको छोड़कर चिरकाल तक तपश्चरण में स्थिर रहा था इसलिये ही यह सुखस्वरूप होकर परमानन्दको प्राप्त हुआ है ।। १९६ ॥ इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? संक्षेप में इतना ही कह देना ठीक है कि मुनि संकल्परहित होकर जिस प्रकारकी जिस जिस वस्तुका परित्याग करता है उसका तपश्चरण उसके लिये वही वही वस्तु उत्पन्न कर देता है ॥ १९७॥ जिस तपश्चरणरूपी चिन्तामणिका फल उत्कृष्ट पदकी प्राप्ति आदि मिलता है और जिससे अर्हन्तदेवकी जाति तथा मूर्ति आदिकी प्राप्ति होती है ऐसी इस पारिव्रज्य नामकी क्रियाका वर्णन किया ।। १९८ ।। जो आगममें कही हुई जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाको प्रमाण मानता हुआ तपस्या धारण करता है अर्थात् दीक्षा ग्रहण करता है उसीके वास्तविक पारिव्रज्य होता है ।।१९९॥ अनेक प्रकारके वचनों के जालमें निबद्ध तथा युक्तिसे बाधित अन्य लोगोंके पारिव्रज्य १ यस्मात् कारणात् । भवति । ५ अनशनव्रती । मृततृप्तयः । ६ आनन्दम् । १३ - मनुत्तमम् ल० । २८७ Jain Education International २ गणधरादिभिः । ३ पादत्राणरहितः । ४ पादन्यासस्य योग्यो ६ अकरोत् । ७ यत् कारणात् । ८ दिव्यतृप्तिविजयतृप्तिपरमतृप्त्य१० प्रसिद्धं तपः । ११ पारमार्थिकम् । १२ अर्हत्सम्बन्धि पारिव्राज्यम् । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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