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________________ २८६ महापुराणम् स महाभ्युदगं प्राप्य जिमो भूत्वाऽऽप्तसक्रियः । देवैविरचितं वीप्रम् प्रास्कन्वत्युपधानकम् ॥१८॥ त्यक्तशीतातपत्राण सकलात्मपरिच्छदः । त्रिभिश्छत्रः समुद्भासिरत्नरुद्भासते स्वयम् ॥१५॥ विविधव्यजन त्यागाद् अनुष्ठिततपोविधिः । चामराणां चतुःषष्ठया वीज्यते जिनपर्यये ॥१८२॥ उज्झितानकसङगीतघोषः कृत्वा तपोविधिम् । स्याद्'धुदुन्दुभिनिर्घोषैः घुष्यमाणजयोदयः ॥१८३॥ उद्यानादिकृतां छायाम् अपास्य स्वां तपो व्यधात् । यतोऽयमत एवास्य स्यादशोकमहाद्रुमः ॥१८४॥ स्वं 'स्वापतेयमुचितं त्यक्त्वा निर्ममतामितः । स्वयं निधिभिरभ्येत्य सेव्यते द्वारि दूरतः॥१८॥ गहशोभां कृतारक्षां दूरीकृत्य तपस्यतः । श्रीमण्डपादिशोभास्य स्वतोऽभ्येति पुरोगताम् ॥१८६॥ तपोऽवगाहनादस्य गहनाम्यधितिष्ठतः। त्रिजगज्जनतास्थानसहं स्यादवगाहनम् ॥१८७॥ क्षेत्रवास्तुसमुत्सर्गात् क्षेत्रज्ञत्वमुपेयुषः। स्वाधीनत्रिजगत्क्षेत्रम् ऐश्यमस्योपजायते ॥१८॥ प्राज्ञाभिमानमुत्सृज्य मौनमास्थितवानयम् । प्राप्नोति परमामाज्ञां सुरासुरशिरोधृताम् ॥१८६॥ स्वामिष्टभृत्यबन्ध्वादिसभामुत्सृष्टवानयम् । परमाप्तपदप्राप्तौ अध्यास्ते त्रिजगत्सभाम् ॥१०॥ रहित हो जाता है और केवल अपनी भुजापर शिरका किनारा रखकर पृथिवीके ऊंचे-नीचे प्रदेशपर शयन करता है वह महाअभ्युदय (स्वर्गादिकी विभूति) को पाकर जिन हो जाता है, उस समय सब लोग उसका आदर-सत्कार करते हैं और वह देवोंके द्वारा बने हुए देदीप्यमान तकियाको प्राप्त ह प्त होता है ।।१७९-१८०।। जो मुनि शीतल छत्र आदि अपने समस्त परिग्रह का त्याग कर देता है वह स्वयं देदीप्यमान रत्नोंसे युक्त तीन छत्रोंसे सुशोभित होता है ॥१८१॥ अनेक प्रकारके पंखाओंके त्यागसे जिसने तपश्चरणकी विधिका पालन किया है ऐसा मुनि जिनेन्द्र पर्यायमें चौंसठ चमरोंसे वीजित होता है अर्थात् उसपर चौंसठ चमर ढुलाये जाते हैं ॥१८२।। जो मुनि नगाड़े तथा संगीत आदिकी घोषणाका त्याग कर तपश्चरण करता है उसके विजयका उदय स्वर्गके दुन्दुभियोंके गम्भीर शब्दोंसे घोषित किया जाता है ॥१८३॥ चकि पहले उसने अपने उद्यान आदिके द्वारा की हुई छायाका परित्याग कर तपश्चरण किया था इसलिये ही अब उसे (अरहन्तअवस्थामें) महाअशोक वृक्षकी प्राप्ति होती है ।।१८४॥ जो अपना योग्य धन छोड़कर निर्ममत्वभावको प्राप्त होता है वह स्वयं आकर दूर दरवाजेपर खड़ी हुई निधियोंसे सेवित होता है अर्थात् समवसरण भूमिमें निधियाँ दरवाजेपर खड़े रहकर उसकी सेवा करती हैं ॥१८५॥ जिसकी रक्षा सब ओरसे की गई थी ऐसी घरकी शोभाको छोड़कर इसने तपश्चरण किया था इसीलिये श्रीमण्डपकी शोभा अपने आप इसके सामने आती है ॥१८६॥ जो तप करने के लिये सघन वनमें निवास करता है उसे तीनों जगत्के जीवोंके लिये स्थान दे सकनेवाली अवगाहन शक्ति प्राप्त हो जाती है अर्थात् उसका ऐसा समवसरण रचा जाता है जिसमें तीनों लोकोंके समस्त जीव सुखसे स्थान पा सकते हैं ।।१८७।। जो क्षेत्र मकान आदिका परित्याग कर शुद्ध आत्माको प्राप्त होता है उसे तीनों जगत्के क्षेत्रको अपने आधीन रखनेवाला ऐश्वर्य प्राप्त होता है ॥१८८॥ जो मुनि आज्ञा देनेका अभिमान छोडकर मौन धारण करता है उसे सर और असरोंके द्वारा शिरपर धारण की हई उत्कृष्ट आज्ञा प्राप्त होती है अर्थात् उसकी आज्ञा सब जीव मानते हैं ॥१८९।। जो यह मुनि अपने इष्ट सेवक तथा भाई आदिको सभाका परित्याग करता है इसलिये उत्कृष्ट अरहन्त पदकी प्राप्ति होनेपर १ उपवर्हम् । २ छत्र । ३ चामर। ४ अर्हपर्याये सति । ५ स्वर्दुन्दुभिभिः । ६ धनम् । 'ट्रव्यं वत्तं स्वापतेयं रिक्थं दृक्थं धनं वसुः' इत्यभिधानात् । ७ निर्गमत्वं गतः । ८ अग्रेसरताम् । है प्रवेशनात् । १० आत्मस्वरूपत्वम् । 'क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः' इत्यभिधानात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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