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________________ २७४ महापुराणम् रक्रियाकलापेनोक्तेन शुद्धिमस्योपविभूतः। उपनीतिरनू चानयोग्यलिङगग्रहो भवेत् ॥५३॥ उपनीतिहि वेषस्य वृत्तस्य समयस्य च । देवतागुरुसाक्षि स्याद् विधिवत्प्रतिपालनम् ॥५४॥ शक्लवस्त्रोपवीतादिधारणं बेष उच्यते । प्रार्यषटकर्मजीवित्वं वृत्तमस्य प्रचक्षते ॥५॥ जैनोपासकदीक्षा स्यात् समयः समयोचितम् । दधतो गोत्रजात्यादि नामान्तरमतः परम् ॥५६॥ इत्युपनीतिक्रिया । १ (ततोऽयमुपनीतः सन् वतचर्या समाश्रयेत् । सूत्रमौपासकं सम्यग् अभ्यस्य ग्रन्थतोऽर्थतः ॥५७॥) इति वतचर्याक्रिया । "व्रतावतारणं तस्य भूयो भूषादिसङग्रहः । भवेदधीतविद्यस्य यथावद्गुरुसन्निधौ ॥५॥ इति वतावतरणक्रिया। विवाहस्तु भवेदस्य नियुञ्जानस्य दीक्षया । सुव्रतोचितया सम्यक् स्वां 'धर्मसहचारिणीम् ॥५६॥ पुनविवाहसंस्कारः पूर्वः सर्वोऽस्य सम्मतः । सिद्धार्चनां पुरस्कृत्य पत्न्याः संस्कारमिच्छतः ॥६०॥ इति विवाहक्रिया। पर्वके दिन उपवासके अन्तमें अर्थात् रात्रिके समय प्रतिमायोग धारण करना उपयोगिता क्रिया कहलाती है ॥५२।। यह उपयोगिता नामकी आठवीं क्रिया है। ऊपर कहे हुए क्रियाओंके समूहसे शुद्धिको धारण करनेवाले उस भव्यके उत्कृष्ट परुषोंके योग्य चिह्नको धारण करने रूप उपनीति क्रिया होती है॥५३॥ देवता और मुरुकी साक्षीपूर्वक विधिके अनुसार अपने वेष, सदाचार और समयकी रक्षा करना. उपनीति क्रिया कहलाती है ॥५४॥ सफेद वस्त्र और यज्ञोपवीत आदि धारण करना वेष कहलाता है, आर्योंके करने योग्य देवपूजा आदि छह कर्मोके करनेको वृत्त कहते हैं और इसके बाद अपने शास्त्रके अनुसार गोत्र जाति आदिके दूसरे नाम धारण करनेवाले पुरुषके जो जैन श्रावककी दीक्षा है उसे समय कहते हैं ॥५५-५६॥ यह उपनीति नामकी नौवीं क्रिया है । तदनन्तर यज्ञोपवीतसे युक्त हुआ भव्य पुरुष शब्द और अर्थ दोनोंसे अच्छी तरह उपासकाध्ययनके सूत्रोंका अभ्यास कर व्रतचर्या नामकी क्रियाको धारण करे । भावार्थ-यज्ञोपवीत धारण कर उपासकाध्ययनाङग (श्रावकाचार) का अच्छी तरहसे अभ्यास क धारण करना व्रतचर्या नामकी क्रिया है ॥५७।। यह दसवीं व्रत'चर्या क्रिया है। जिसने समस्त विद्याएं पढ़ ली हैं ऐसा श्रावक जब गुरुके समीप विधिके अनुसार फिरसे आभूषण आदि ग्रहण करता है तब उसके व्रतावतरण नामकी क्रिया होती है ॥५८।। यह व्रतावतरण नामकी ग्यारहवीं क्रिया है । जब वह भव्य अपनी पत्नीको उत्तम व्रतोंके योग्य श्रावककी दीक्षासे युक्त करता है तब उसके विवाह नामकी क्रिया होती है ॥५९॥ अपनी पत्नीके संस्कार चाहने वाले उस भव्यके उसी स्त्रीके साथ फिरसे विवाह संस्कार होता है और उस संस्कारमें सिद्ध भगवान्की पूजाको आदि लेकर पहले कही हुई समस्त विधि करनी चाहिये ॥६०॥ यह वारहवीं विवाहक्रिया है। १क्रियासम हेन । २ प्रवचने साङगेऽधीती। ३ यज्ञोपवीत । 'उपवीतं यज्ञसूत्रं प्रोदधृतं दक्षिणे करे'। ४ व्रतावतरणम् ल०। ५ धर्मपत्नीम्। ६ गर्भान्वयक्रियास प्रोक्तः। ७ जिनदर्शनस्वीकारात् प्रागविवाहितभार्यायाः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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