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________________ भालोडितेन विधिना नियमिति " २७२ महापुराणम् श्रत्वेति देशनां तस्माद् भव्योऽसौ देशिकोत्तमात् । सन्मार्गे मतिमाधत्ते दुर्गिरतिमुत्सृजन् ॥३३॥ गुरुर्जनयिता' तत्त्वज्ञानं गर्भः सुसंस्कृतः । तदा तत्रावतीर्णोऽसौ भव्यात्मा धर्मजन्मना ॥३४॥ अवतारक्रियाऽस्यैषा गर्भाधानवदिष्यते । यतो जन्मपरिप्राप्तिः उभयत्र न विद्यते ॥३५॥ इत्यवतारक्रिया। ततोऽस्य वृत्तलाभः स्यात् तदेव गुरुपादयोः। प्रणतस्य व्रतवातं 'विधानेनोपसेदुषः ॥३६॥ इति वृत्तलाभः । ततः कृतोपवासस्य पूजाविधिपुरःसरः । स्थानलाभो भवेदस्य "तत्रायमुचितो विधिः ॥३७॥ जिनालये शुचौ रङगे पद्ममष्टदलं लिखेत् । विलिखेद् वा जिनास्थानमण्डलं समवृत्तकम् ॥३८॥ श्लक्षेण पिष्टचूर्णेन 'सलिलालोडितेन वा। वर्तन मण्डलस्यष्टं चन्द्रनादिद्रवेण वा ॥३६॥ तस्मिन्नष्टदले पद्मे जैने वाऽऽस्थानमण्डले। विधिना लिखिते तज्ज्ञविष्वग्विरचितार्चने ॥४०॥ जिना भिमुखं सूरिः विधिनैनं निवेशयेत् । तवोपासकदीक्षेयमिति मनि मुहुः स्पृशन् ॥४१॥ १०पञ्चमुष्टिविधानेन स्पृष्ट्वैनमधिमस्तकम् । पूतोऽसि दीक्षयेत्युक्त्वा सिद्धशेषा च लम्भयेत् ॥४२॥ ततः पञ्चनमस्कारपदान्यस्मा उपादिशेत् । मन्त्रोऽयमखिलात् १"पापात्त्वां पुनीता"दितीरयन् ॥४३॥ कृत्वाविधिमिमं पश्चात् पारणाय विसर्जयेत् । गुरोरनुग्रहात सोऽपि सम्प्रीतः स्वगृहं ब्रजेत् ॥४४॥ इति स्थानलाभः ।। सुनकर मिथ्यामार्गमें प्रेम छोड़ता हुआ समीचीन मार्गमें अपनी बुद्धि लगाता है ॥३३॥ उस समय गुरु ही उसका पिता है और तत्त्वज्ञान ही संस्कार किया हुआ गर्भ है। वह भव्य पुरुष धर्म रूप जन्मके द्वारा उस तत्त्वज्ञानरूपी गर्भमें अवतीर्ण होता है ॥३४॥ इसकी यह क्रिया गर्भाधानक्रियाके समान मानी जाती है क्योंकि जन्मकी प्राप्ति दोनों ही क्रियाओंमें नहीं है ॥३५।। इस प्रकार यह पहली अवतारक्रिया है ।। तदनन्तर-उसी समय गुरुके चरणकमलोंको नमस्कार करते हुए और विधिपूर्वक व्रतोंके समहको प्राप्त होते हए उस भव्यके वृत्तलाभ नामकी दूसरी क्रिया होती है ॥३६।। यह वृत्तलाभ नामकी दूसरी क्रिया है। । तत्पश्चात् जिसने उपवास किया है ऐसे उस भव्यके पूजाकी विधिपूर्वक स्थानलाभ नामकी तीसरी क्रिया होती है। इस क्रियामें यह विधि करना उचित है ॥३७॥ जिनालयमें किसी पवित्र स्थानपर आठ पांखुरीका कमल बनावे अथवा गोलाकार समवसरणके मंडलकी रचना करे ॥३८॥ इस कमल अथवा समवसरणके मण्डलकी रचना पानी मिले हुए महीन चूर्णसे अथवा घिसे हुए चन्दन आदिसे करनी चाहिये ॥३९।। उस विषयके जानकार विद्वानोंके द्वारा लिखे हुए उस अष्टदलकमल अथवा जिनेन्द्र भगवान्के मण्डलकी जब सम्पूर्ण पूजा हो चके तब आचार्य उस भव्य पुरुषको जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाके सन्मुख बैठावे और बार बार उसके मस्तकको स्पर्श करता हुआ कहे कि यह तेरी श्रावककी दीक्षा है ॥४०-४१॥ पञ्चमुष्टिकी रीतिसे उसके मस्तकका स्पर्श करे तथा 'तू इस दीक्षासे पवित्र हुआ' इस प्रकार कहकर उससे पूजाके बचे हुए शेषाक्षत ग्रहण करावे ॥४२॥ तत्पश्चात् 'यह मन्त्र तुझे समस्त पापोंसे पवित्र करे' इस प्रकार कहता हुआ उसे पञ्च नमस्कार मन्त्रका उपदेश करे ॥४३॥ यह विधि करके आचार्य उसे १ पिता । २ धर्म एव जन्म तेन । ३ यस्मात् कारणात् । ४ गर्भाधानावतारयोः । ५ व्रतविचरणशास्त्रोक्तविधिना । ६ उपगतस्य । ७ स्थानलाभे । ८ जलमिश्रितेन वा । ६ उद्धरणम् । १० पञ्चगुरुमुद्राविधानेन । ११ मूनि । १२ प्रापयेत् । १३ अस्मै उपदेशं कुर्यात् । १४ दुष्कृतात् अपसार्य। १५ पवित्र कुर्यात् । १६ ब्रुवन् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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