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________________ अष्टत्रिंशत्तम पर्व कृतार्हत्पूजनस्यास्य मौजीबन्धो जिनालये। गरुसाक्षिविधातव्यो व्रतार्पणपुरस्सरम् ॥१०॥ शिखी सितांशुकः सान्तर्वासा' निर्वेषविक्रियः । व्रतचिह्नं दधत्सूत्रं तदोक्तो ब्रह्मचार्यसौ॥१०६) चरणोचितमन्यच्च नामधेयं तदस्य वै। वक्तिश्च भिक्षयाऽन्यत्र राजन्यादुद्धवैभवात् ॥१०॥ 'सोऽन्तःपुर चरेत् पात्र्यां" नियोग इति केवलम् । तदनं देवसात्कृत्य ततोऽन्नं योग्यमाहरेत् ॥१०८ . इत्युपनीतिः। व्रतचर्यामतो वक्ष्य क्रियामस्योपबिभतः। कटयरूरःशिरोलिङगम् मनूचानव्रतोचितम् ॥१०॥ कटीलिडरगं भवेवस्य मौजीबन्धात्त्रिभिर्गणः। रत्नत्रितयशुदध्यङ्ग तद्धि चिह्न द्विजात्मनाम् ॥११०॥ तस्पेष्टमूरुलिङागं च सुधौतसितशाटकम् । पार्हतानां कुलं पूतं विशालं चेति सूचने ॥१११॥ उरोलिङगमथास्य स्याद् ग्रथितं सप्तभिर्गुणः। यज्ञोपवीतकं सप्तपरमस्थानसूचकम् ॥११२॥ शिरोलिडगं च तस्यष्टं परं मौण्डघमनाविलम् । मौण्डचं मनोवच:कायगतमस्योपबृहयत् ॥११३॥ एवंप्रायेण५ लिडगेन विशुद्धं धारयेद व्रतम् । स्थूहिंसाविरस्यादि ब्रह्मचर्योपबृहितम् ॥११४॥ दन्तकाष्ठग्रहो नास्य न ताम्बूलं न चाञ्जनम् । न हरिद्रादिभिः स्नानं शुद्धस्नानं दिन प्रति ॥११॥ जाती हैं ॥१०४॥ प्रथम ही जिनालयमें जाकर जिसने अर्हन्तदेवकी पूजा की है ऐसे उस बालकको व्रत देकर उसका मौजीबन्धन करना चाहिये अर्थात् उसकी कमरमें मूंजकी रस्सी बांधनी चाहिये ॥१०५।। जो चोटी रखाये हुए है, जिसकी सफेद धोती और सफेद दुपट्टा है, जो वेष और विकारोंसे रहित है, तथा जो व्रतके चिह्नस्वरूप यज्ञोपवीत सूत्रको धारण कर रहा है ऐसा वह बालक उस समय ब्रह्मचारी कहलाता है ॥१०६॥ उस समय उसके आचरणके योग्य और भी नाम रक्खे जा सकते हैं। उस समय बड़े वैभवशाली राजपुत्रको छोड़कर सबको भिक्षावृत्तिसे ही निर्वाह करना चाहिये और राजपुत्रको भी अन्त:पुरमें जाकर माता आदिसे किसी पात्रमें भिक्षा मांगनी चाहिये, क्योंकि उस समय भिक्षा लेनेका यह नियोग ही है। भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो उसका अग्रभाग श्री अरहन्तदेवको समर्पण कर बाकी बचे हुए योग्य अन्नका स्वयं भोजन करना चाहिये ॥१०७-१०८॥ यह चौदहवीं उपनीति क्रिया है। ___ अथानन्तर ब्रह्मचर्य व्रतके योग्य कमर, जांघ, वक्षःस्थल और शिरके चिह्नको धारण करनेवाले इस ब्रह्मचारी बालककी व्रतचर्या नामकी क्रियाका वर्णन करते हैं ॥१०९॥ तीन लरकी मजकी रस्सी बांधनेसे कमरका चिह्न होता है, यह मौंजीबन्धन रत्नत्रयकी विशुद्धिका अंग है और द्विज लोगोंका एक चिह्न है ॥११०॥ अन्त्यन्त धुली हुई सफेद धोती उसकी जांघ का चिह्न है, वह धोती यह सूचित करती है कि अरहन्त भगवान् का कुल पवित्र और विशाल है ॥१११।। उसके वक्षःस्थलका चिह्न सात लरका गुंथा हुआ यज्ञोपवीत है, यह यज्ञोपवीत सात परमस्थानोंका सूचक है ॥११२। उसके शिरका चिह्न स्वच्छ और उत्कृष्ट मुण्डन है जो कि उसके मन, वचन, कायके मुण्डनको बढ़ानेवाला है । भावार्थ-शिर मुण्डनसे मन, वचन, काय पवित्र रहते हैं ॥११३॥ प्रायः इस प्रकारके चिह्नोंसे विशुद्ध और ब्रह्मचर्य से बढ़े हुए स्थूल हिंसाका त्याग (अहिंसाणु व्रत)आदि व्रत उसे धारण करना चाहिये ।।११४।। इस ब्रह्मचारीको वृक्षकी दातौन नहीं करनी चाहिये, न पान खाना चाहिये, न अंजन लगाना चाहिये और न हल्दी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये, उसे प्रतिदिन केवल १ अन्तर्वस्त्रेण सहितः । २ वेषविकाररहितः। ३ यज्ञसूत्रम् । ४ वर्तनायोग्यम् । ५ तदास्य ल०। ६ राजन्यः । ७ पात्रे भिक्षां प्रार्थयेदित्यर्थः । ८ भिक्षान्नम्। ६ देवस्य चरुं समर्प्य । १० शेषान्नं भुजीत । ११ -महं ल०। १२ ब्रह्मचर्यव्रत । १३ धवलवस्त्रम् । १४ उष्णीषादिरहितम् । १५ एवं प्रकारेण । ३२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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