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________________ २४८ महापुराणम् गते मासपृथक्त्ये च जन्माद्यस्य यथाक्रमम् । अन्नप्राशनमाम्नातं पूजाविधिपुरःसरम् ॥६५॥ इति अन्नप्राशनम् । ततोऽस्य हायने पूर्णे ठघुष्टिनम क्रिया मता। वर्षवर्धनपर्यायशब्दवाच्या यथाश्रुतम् ॥६६॥ "अत्रापि पूर्ववद्दानं जैनी पूजा च पूर्ववत् । इष्टबन्धसमा ह्वानं समाशादिश्च लक्ष्यताम् ॥१७॥ इति व्युष्टिः ।। केशवापस्तु केशानां शुभेऽह्नि व्यपरोपणम् । क्षौरेण कर्मणा देवगुरुपूजापुरःसरम् ॥१८॥ गन्धोदकाद्रितान् कृत्वा केशान् शेषाक्षतोचितान् । मौण्डयमस्य विधेयं स्यात् सचूलं स्वाऽन्वयोचितम् स्नपनोदकधौताङगम् अनुलिप्तं सभूषणम् । प्रणमय्यर मुनीन् पश्चाद् योजयेद् बन्धुनाशिषा ॥१०॥ चौलाख्यया प्रतीतेयं कृतपुण्याहमडागला । क्रियास्यामादृतो लोको यतते परया मुदा ॥१०१॥ इति केशवापः । (ततोऽस्य पञ्चमे वर्षे प्रथमाक्षरदर्शने । ज्ञेयः क्रियाविधिर्नाम्ना लिपिसङखचानसङग्रहः ॥१०२॥ ययाविभवमत्रापि ज्ञेयः पूजापरिच्छदः । उपाध्यायपदे चास्य मतोऽधीती१३ गृहवती ॥१०३॥ इति लिपिसअखचानसङग्रहः । क्रियोपनीति मास्य वर्षे गर्भाष्टमे मता । यत्रापनीतकेशस्य मौजी सव्रतबन्धना ॥१०४॥ जब क्रम क्रमसे सात आठ माह व्यतीत हो जाये तब अर्हन्त भगवानको पूजा आदि कर बालकको अन्न खिलाना चाहिये ॥९५॥ यह दसवीं अन्नप्राशन क्रिया है। तदनन्तर एक वर्ष पूर्ण होनेपर व्युष्टि नामकी क्रिया की जाती है इस क्रियाका दूसरा नाम शास्त्रानुसार वर्षवर्धन है ॥९६।। इस क्रिया में भी पहले ही के समान दान देना • चाहिये, जिनेन्द्र भगवान की पूजा करनी चाहिये, इष्टबन्धुओंको बुलाना चाहिये और सबको भोजन कराना चाहिये ॥९७॥ यह ग्यारहवीं व्युष्टि क्रिया है। तदनन्तर, किसी शुभ दिन देव और गुरुको पूजाके साथ साथ क्षौरकर्म अर्थात् उस्तरासे बालकके बाल बनवाना केशवाप क्रिया कहलाती है ॥९८॥ प्रथम ही बालोंको गन्धोदकसे गीला कर उनपर पूजाके बचे हुए शेष अक्षत रखे और फिर चोटी सहित अथवा अपनी कुलपद्धतिके अनसार उसका मुंडन करना चाहिये ।।९९|| फिर स्नान कराने के लिये लाये हुए जलसे जिसका समस्त शरीर साफ कर दिया गया है, जिस पर लेप लगाया गया है और जिसे उत्तम आभूषण पहिनाये गये हैं ऐसे उस बालकसे मुनियोंको नमस्कार करावे, पश्चात् सब भाई, बन्धु उसे आशीर्वादस युक्त करें ॥१००। इस क्रि याम पुण्याहमंगल किया जाता है और यह चौल क्रिया नामसे प्रसिद्ध है इस शियामें आदरको प्राप्त हुए लोग बड़े हर्षसे प्रवृत्त होते हैं ।।१०१॥ यह केशवाप नामकी वारहवीं क्रिया है। तदनन्तर पांचवें वर्ष में बालकको सर्वप्रथम अक्षरोंका दर्शन करानेके लिये लिपिसंख्यान नामकी क्रियाकी विधि की जाती है ।।१०।। इस क्रियामें भी अपने वैसबके अनसार पूजा आदिकी सामग्री जुटानी चाहिये और अध्ययन कराने में कुशल व्रती गृहस्थको ही उस बालकके अध्यापकक पदपर नियुक्त करना चाहिये ॥१०३॥ यह तेरहवीं लिपिसंख्यान क्रिया है । गर्भसे आठवें वर्ष में बालककी उपनीति (यज्ञोपवीत धारण) क्रिया होती है। इस क्रियामें केशोंका मुण्डन, व्रतबन्धन तथा मौजीबन्धनकी क्रियाएं की १ सप्ताष्टमासे । २ जन्मदिनात् प्रारभ्य। ३ संवत्सरे । 'संवत्सरो वत्सरोऽब्दो हायनोऽस्त्री शरत् समा' इत्यभिधानात् । ४ शास्त्रानुसारेण । ५ तत्रापि ल० । ६ सहभोजनादिः । ७ अपनयनम् । ८ चूडासहितम् । शिखासहितमित्यर्थः। ६ वान्वयोचितम् ल । चान्वयोचितम् द० । १० अलङ्कारयुक्तशिश म् । ११ मुनिभ्यो नमनं कारयित्वा । १२ बन्धुसमूहकुताशीर्वचनेन । १३ अधीतवान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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