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________________ २१६ महापुराणम् फणमात्रोद्गता रन्धात्' फणिनः सित योऽद्युतन् । कृताः कुवलयैरर्धा मुनेरिव पदान्तिक॥१७२॥ रेजुर्वनलता नमः शाखाप्रैः कुसुमोज्ज्वलैः। मुनि भजन्त्यो भक्त्येव पुष्पाघुर्नतिपूर्वकम् ॥१७३॥ शश्वद्विकासिकुसुमैः शाखारनि लाहत:। बभुर्वनद्रुमास्तोषान्निनृत्सव' इवासकृत् ॥१७४॥ कलैरलिरुतोद्गातः फणिनो नन्तः किल । उत्फणा: फणरत्नांशुदी गै'विवर्तितः ॥१७॥ पुंस्कोकिलकलालापडिण्डिमानुगतलयः । चक्षुःश्रवस्सु पश्यत्सु तद्विषोऽनटिषुहुः ॥१७६॥ महिम्ना शमिनः शान्तमित्यभूत्तच्च काननम् । धत्ते हि महतां योगः१२ शममप्यशमात्मसु ॥१७७॥ शान्तस्वदन्ति स्म वनान्तेऽस्मिन् शकुन्तयः । घोषयन्त इवात्यन्तं शान्तमेतत्तपोवनम् ॥१७॥ तपोऽनुभावादस्यैवं प्रशान्तेऽस्मिन् वनाश्रये। विनिपातः५ कुतोऽप्यासीत् कस्यापि न कथञ्चन ॥१७॥ "महसास्य तपोयोगजु म्भितेन महीयसा। बभूवुर्हतहृद्ध्वान्ताः तिर्य-चोऽप्यनभिद्रुहः ॥१८०॥ गतिस्खलनतो ज्ञात्वा योगस्थं तं मुनीश्वरम् । असकृत्पूजयामासुः अवतीर्य नभश्चराः॥१८१॥ महिम्नाऽस्य तपोवीर्य जनितेनालघीयसा । मुहुरासनकम्पोऽभून्नतमूनां सुधाशिनाम् ॥१८२॥ तपश्चरण कैसी शान्ति उत्पन्न करनेवाला है, ॥१७०॥ वे मुनिराज चरणोंके सभीप आये हुए सोके काले फणाओंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पूजाके लिये नीलकमलोंकी मालाएँ ही बनाकर रक्खी हों ॥१७१॥ बामीके छिद्रोंसे जिन्होंने केवल फणा ही बाहर निकाले हैं ऐसे काले सर्प उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो मुनिराजके चरणोंके समीप किसीने नीलकमलोंका अर्व ही बनाकर रक्खा हो ।।१७२॥ वनको लताएं फूलोंसे उज्ज्वल तथा नीचेको झुकी हुई छोटी छोटी डालियोंसे ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थीं मानो फूलोंका अर्घ लेकर भक्तिसे नमस्कार करती हुई मुनिराजकी सेवा ही कर रही हों ॥१७३॥ वनके वृक्ष, जिनपर सदा फूल खिले रहते हैं और जो वायुसे हिल रहे हैं ऐसे शाखाओंके अग्रभागोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो संतोषसे बार बार नृत्य ही करना चाहते हों ॥१७४।। जिनके फणा ऊंचे उठ रहे हैं ऐसे सर्प, भमरोंके शब्दरूपी सुन्दर गाने के साथ साथ फणाओंपर लगे हुए रत्नोंकी किरणोंसे देदीप्यमान अपने फणाओंको घमा घमाकर नत्य कर रहे थे ।।१७५।। मोर, कोकिलोंके सुन्दर शब्दरूपी डिण्डिम बाजेके अनुसार होनेवाले लयके साथ साथ सर्पोके देखते रहते भी बार बार नत्य कर रहे थे ॥१७६॥ इस प्रकार अतिशय शान्त रहनेवाले उन मनिराजक माहात्म्यसे वह वन भी शान्त हो गया था सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुषोंका संयोग कर जीवा में भी शान्ति उत्पन्न कर देता है ॥१७७॥ इस वनमें अनेक पक्षी शान्त शब्दोंसे चहक रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो इस बातकी घोषणा ही कर रहे हों कि यह तपोवन अत्यन्त शान्त है ॥१७८॥ उन मुनिराजके तपके प्रभावसे यह वनका आश्रम ऐसा शान्त हो गया था कि यहांके किसी भी जीवको किसोके भी द्वारा कुछ भी उपद्रव नहीं होता था ।।१७९।। तपके सम्बन्धसे बड़े हुए मुनिराजके बड़े भारी ते जसे तिर्य चोंक भी हृदयका अन्धकार दूर हो गया था और अब वे परस्परमें किसीसे द्रोह नहीं करते थे-अहिंसक हो गये थे ।।१८०।। विद्याधर लोग गति भंग हो जानेसे उनका सद्भाव जान लेते थे और विमानसे उतरकर ध्यान में बैठे हए उन म निराजकी बार बार पूजा करते थे ।।१८१॥ तपकी शक्तिसे उत्पन्न हए मनिराजके बड़े भारी माहात्म्यसे जिनके मस्तक झके हुए हैं ऐसे देवोंके आसन भी बार बार कम्पाय १वल्मीकविलात् । २ कृष्णाः । ३ नतितुमिच्छवः । ४-दगीतैः ल०। ५दीप्तै-इ०, ल० । ६ शरीरैः । ७ तालनिबद्धैः । ८ सर्पेषु। कुण्डली गूढपाच्चक्षुःश्रवाः काकोदरः फरणी' इत्यभिधानात् । ६ सर्पद्विषः । मयूरा इत्यर्थः । १० नटन्ति स्म । ११ यतेः । १२ संयोगः । १३ क्रूरस्वरूपेषु । १४ अत्यन्तं प्रसन्नम् । १५ बाधेत्यर्थः । १६ तेजसा । १७ अहिंसका: । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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