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________________ षट्त्रिंशत्तमं पर्व अनित्यात्राणसंसारकत्वाऽन्यत्वान्यशौचताम् । निर्जरास्त्रवसंरोधलोकस्थित्यनुचिन्तनम् ॥१५॥ धर्मस्याख्याततां बोधेः दुर्लभत्वं च लक्षयन् । सोऽनुप्रेक्षाविधि दध्यो विशुद्धं द्वादशात्मकम् ॥१६०॥ प्राज्ञापायौ विपाकं च संस्थानं चानुचिन्तयन् । सध्यानमभजद् धयं कर्माशान् परिशातयन् ॥१६॥ दीपिकायामिवामण्यां ध्यानदीप्तौ निरीक्षिताः। क्षणं विशीर्णाः कर्माशाः कज्जलांशा इवाभितः ॥१६२॥ तद्देहदीप्तिप्रसरो दिङमुखेषु परिस्फुरन् । तद्वनं गारुड़ग्रावच्छण्यातत मिवातनोत् ॥१६३॥ तत्पदोपान्तविश्रान्ता विस्त्र बधा मृगजातयः । बबाधिरे मृगैर्नान्यः क्रूरैरक्रूरतां शितैः ॥१६४॥ विरोधिनोऽप्यमी मुक्तविरोध स्वरमासिताः। तस्योपाधोसिंहाद्याः शशंसुवैभवं मुनेः ॥१६॥ जरज्जम्बकमाधाय मस्तके 'व्याघ्रधेनुका। स्वशावनिविशेष ताम् पीप्यत् स्तन्यमात्मनः॥१६६॥ करिणो हरिणारातीनन्वीयु : सह यूथपैः ।. स्तनपानोत्सुका भेजुः करिणीः सिंहपोतकाः ॥१६७॥ कलभान् कलभाङतारमुखरान् नखरैः खरैः। कण्ठोरवःस्पृशन् कण्ठे नाभ्यनन्दि" न यूथपैः ॥१६॥ करिण्यो विसिनीपुत्रपुट: पानीयमानयत् । तद्योगपीठपर्यन्तभुवः सम्माजनेच्छया ॥१६॥ "पुष्करैः "पुष्करोदस्तैः यस्तरधिपदद्वयम्। स्तम्बरमा मुनि भेजुः अहो शमकरं तपः ॥१७०॥ उपाधि भोगिनां भोगः विनीलैर्यरुचन्मुनिः। विन्यस्तैरर्चनायेव नीलरुत्पलदामकैः ॥१७१॥ अनित्य , अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्माख्यातत्त्व इन बारह भावनाओंका उन्होंने विशद्ध चित्तसे चिन्तवन किया था ॥१५९-१६०॥ व आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थानका चिन्तवन करते हए तथा कर्मोंके अंशोंको क्षीण करते हए धर्मध्यान धारण करते थे ॥१६॥ जिस प्रकार दीपिकाक प्रज्वलित होने पर उसके चारों ओर कज्जलके अंश दिखाई देते हैं उसी प्रकार उनकी ध्यानरूपी दीपिकाके प्रज्वलित होने पर उसके चारों ओर क्षणभर नष्ट हुए कर्मो के अंश दिखाई देते थे ॥१६२।। सब दिशाओं में फैलता हुआ उनके शरीरकी दीप्तिका समूह उस वनको नीलमणिकी कान्तिसे व्याप्त हआ सा बना रहा था ।।१६३॥ उनके चरणोंके समीप विश्राम करनेवाले मृग आदि पशु सदा विश्वस्त अर्थात् निर्भय रहते थे, उन्हें सिंह आदि दुष्ट जीव' कभी बाधा नहीं पहुँचाते थे क्योंकि वे स्वयं वहां आकर अक्रूर अर्थात् शान्त हो जाते थे ॥१६४।। उनके चरणोंके समीप हाथी, सिंह आदि विरोधी जीव भी परस्परका वैर-भाव छोड़कर इच्छानसार उठते बैठते थे और इस प्रकार वे मुनिराजके ऐश्वर्यको सूचित करते थे ।।१६५॥ हालकी व्याई हुई सिंही भैसेके बच्चेका मस्तक सूंघकर उसे अपने बच्चे के समान अपना दूध पिला रही थी ॥१६६॥ हाथी अपने झण्डके मखियों के साथ साय सिंहोंके पीछे पीछे जा रहे थे और स्तनके पीते में उत्सुक हुए सिंहके बच्चे हथिनियोंके समीप पहुँच रहे थे ।।१६७॥ बालकपनके कारण मधुर शब्द करते हुए हाथियों के बच्चों को सिंह अपने पैने नाखूनोंसे उनकी गर्दनपर स्पर्श कर रहा था और ऐसा करते हुए उस सिंहको हाथियोंके सरदार बहुत ही अच्छा समझ रहे थे-उसका अभिनन्दन कर रहे थे ॥१६८॥ उन मुनिराजके ध्यान करने के आसनके समीपकी भमिको साफ करने की इच्छासे हथिनियां कमलिनीके पत्तोंका दोना बनाकर उनमें भर भरकर पानी ला रही थीं ॥१६९।। हायी अपनी सूड के अग्रभागसे उठाकर लाये हुए कमल उनके दोनों चरणोंपर रख देते थे और इस तरह वे उनकी उपासना करते थे। अहा, १ संवर। २ ध्यायति स्म। ३ आज्ञाविचयापायविचयौ। ४ कृशीकुर्वन् । ५ व्याप्तम् । ६ निश्चलाः । ७ विरोधाः ल०, प०, अ०, स०, द०,। ८ जरज्जन्तुक ल०, इ० । जरत् वृद्ध । ६ नवप्रसूतव्याधी। १० समानम् । ११ पाययति स्म । १२ स्तनक्षीरम् । १३ मनोज्ञ-ध्वनिनिर्विशेषान । १४ द्वौ नौ पूर्वमर्थ गमयतः, अभ्यनन्दीदित्यर्थः । १५ कमलैः । १६ कराग्रोद्धतः । १७ सर्पाणां शरीरैः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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