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________________ १८० महापुराणम् 'तदेत्य द्रुतमायुष्मन् पूरयास्य मनोरथम् । युवयोरस्तु साङगत्यात् सङगतं निखिलं जगत् ॥८॥ इति तद्वचनस्यान्ते कृतमन्दस्मितो युवा । धीरं वचो गभीरार्थम् प्राचचक्षे विचक्षणः ॥८६॥ साधूक्तं साधु वृत्तत्वं त्वया घटयता प्रभोः । वाचस्पत्यं तदेवेष्टं पोषकं स्वमतस्य यत् ॥१०॥ साम दर्शयता नाम भेददण्डौ विशेषतः। प्रयजानेन साध्यऽर्थे' स्वातन्त्र्यं दर्शितं त्वया ॥१॥ स्वतन्त्रस्य प्रभोः सत्यं स त्वमन्तश्च रश्चरः । अन्यथा कथमेवास्य व्यनंक्ष्यन्तर्गतं गतम् ॥२॥ निसृष्टार्थतयाऽस्मासु' 'निदिष्टस्त्वं निधीशिना । विशिष्टोऽसि न वैशिष्टयं परमर्मस्पृगीदृशम् ॥३॥ अयं खल खलाचारो यबलात्कारदर्शनम् । स्वगुणोत्कीर्तनं दोषोद्भावनं च परेषु यत् ॥१४॥ विवृणोति खलोऽन्येषां दोषान् स्वांश्च गुणान् स्वयम् । संवणोति च दोषान् स्वान् परकीयान् गुणानपि ॥६५॥ अनिराकृतसन्तापा समनोभि:१० समुज्झिताम् । फलहीनां श्रयत्यज्ञः१ खलतां२ खलतामिव३ ॥६६॥ सतामसम्मतां विष्वग आचितां विरसैः फलैः । मन्ये दुःखलतामेनां खलतां लोकतापिनीम् ॥७॥ सोपप्रदान" सामादौ प्रयुक्तमपि बाध्यते । पराभ्यां भेददण्डाभ्यां न्याय्ये५ विप्रतिषेधिनि ॥८॥ हो रहे हैं ।।८७॥ इसलिये हे दीर्घायु कुमार, आप शीघ्र ही चलकर इसके मनोरथ पूर्ण कीजिये आप दोनों भाइयोंके मिलापसे यह समस्त संसार मिलकर रहेगा ।।८८।। इस प्रकार उस दूतके कह चुकने के बाद चतुर और जवान बाहुबली कुमार कुछ मन्दमन्द हँसकर गंभीर अर्थसे भरे हुए धीर वीर वचन कहने लगे ॥८९।। वे बोले कि हे दूत, अपने स्वामी की साधु वृत्तिको प्रकट करते हुए तूने सब सच कहा है क्योंकि जो अपने मतकी पुष्टि करनेवाला हो वही कहना ठीक होता है ॥९०॥ साम अर्थात् शान्ति दिखलाते हुए तुने विशेषकर भेद और दण्ड भी दिखला दिये हैं तथा उनका प्रयोग करते हुए तूने यह भी बतला दिया कि तूं अपना अर्थ सिद्ध करने में कितना स्वतन्त्र है ? ॥९१।। इस प्रकार कहनेवाला तूं सचमुच ही अपने स्वतन्त्र स्वामीका अन्तरङ्ग दूत है, यदि ऐसा न होता तो तूं उसके हृदयगत अभिप्रायको कैसे प्रकट कर सकता था ॥९२॥ चक्रवर्तीने तुझपर समस्त कार्यभार सौंपकर मेरे पास भेजा है, यद्यपि तु चतुर है तथापि इस प्रकार दूसरेका मर्मछेदन करना चतुराई नहीं है ।।९३।। अपनी जबर्दस्ती दिखलाना वास्तवमें दुष्टोंका काम है तथा अपने गुणों का वर्णन करना और दूसरोम दोष प्रकट करना भी दुष्टोका ही काम है ।।९४॥ दुष्ट पुरुष, दूसरक दोष और अपने गणोंका स्वयं वर्णन किया करते हैं तथा अपने दोष और दुसरेके गणोंको छिपाते रहते हैं ॥९५॥ खलता अर्थात् दुष्टता खलता अर्थात् आकाशकी बेलके समान है क्योंकि जिस प्रकार आकाशकी बेलसे किसीका संताप दूर नहीं होता उसी प्रकार दुष्टतासे किसी का संताप दूर नहीं होता, जिस प्रकार आकाशकी बेल सुमन अर्थात् फूलोंसे शून्य होती है उसी प्रकार दुष्टता भी सुमन अर्थात् विद्वान् पुरुषोंसे शून्य होती है और जिस प्रकार आकाशकी बेल फलरहित होती है उसी प्रकार दुष्टता भी फलरहित होती है अर्थात् उससे किसीको कुछ लाभ नहीं होता, ऐसी इस दुष्टताका केवल मूर्ख लोग ही आश्रय लेते हैं ॥९६।। जो सज्जन पुरुषोंको इष्ट नहीं है, जो सब ओरसे विरस अर्थात् नीरस अथवा विद्वेषरूपी फलोंसे व्याप्त है तथा लोगोंको संताप देनेवाली है ऐसी इस खलता-दुष्टताको मैं दुःखलता अर्थात् दुःखकी बेल ही समझता हूँ ॥९७।। यदि न्यायपूर्ण विरोध करनेवाले पुरुषके विषय १तत् कारणात् । २ वचः । ३ शान्तिम् । ४ परब्रह्मकरणादिप्रयोजने। ५ हृदय वर्तमानः । ६ व्यक्तं करोषि । ७ बुद्धिम् । ८ असकृत् सम्पादितप्रयोजनतया । ६ नियुक्तः । १० कुसुमैः । शोभनहृदयश्च । ११ श्रयन्त्यज्ञाः ल०, द०। १२ दुर्जनत्वम् । १३ आकाशलतामिव । १४ दानसहितम् । १५ न्यायान्विते पुरुषे । १६ भेददण्डाभ्यां विकारं गच्छति सति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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