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________________ पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व कृतोऽभिषेको यस्याराद् अभ्यत्य सुरसत्तमैः । यस्याचलेन्द्रकूटेषु स्थलपदायितं यशः ॥७६॥ रत्नाधैः पर्युपासातां यं स्वर्धन्यधिदेवते । वृषभाद्रितटे येन टङकोत्कीणं कृतं यशः ॥७७॥ घटदासीकृता लक्ष्मीः सुराः किङकरतां गताः । यस्य स्वाधीनरत्नस्य निधयः सुवते धनम् ॥७८॥ स यस्य जयसैन्यानि निजित्य निखिला दिशः । भमन्ति स्माखिलाम्भोधितटान्तवनभूमिषु ॥७॥ त्वामायुष्मन् जगन्मान्यो मानयन कुशलाशिषा । समादिशन्ति चक्राङका प्रथयन्नधिराजताम् ॥८॥ मदीयं राज्यमाक्रान्तनिखिलद्वीपसागरम् । राजतेऽस्मत्प्रियभात्रा न बाहुबलिना विना ॥१॥ ताः सम्पदस्तदैश्वयं ते भोगाः स परिच्छदः । ये समं बन्धुभिर्भुक्ताः संविभक्तसुखोदयः ॥८२॥ अन्यच्च नमिताशेषनसुरासुरखेचरम् । नाधिराज्यं विभात्यस्य प्रणामविमुखे त्वयि ॥३॥ न दुनोति मनस्तीवं रिपुरप्रणतस्तथा । बन्धुरप्रणमन् गर्वाद दुविदग्धो यथा प्रभुम् ॥८४॥ 'तदुपेत्य प्रणामेन पूज्यतां प्रभुरक्षमी । प्रभुप्रणतिरेवेष्टा प्रसूतिर्ननु सम्पदाम् ॥८॥ अवन्ध्यशासनस्यास्य शासनं ये विमन्वते । शासनं द्विषतां तेषां चक्रमप्रतिशासनम् ॥८६॥ प्रचण्डदण्डनिर्घात निपातपरिखण्डितान् । तदाज्ञाखण्डनव्यग्रान् पश्यनान्० मण्डलाधिपान् ॥८७॥ सेनासे हराकर और जबरदस्ती उनका धन छीनकर उनपर विजय प्राप्त की है ।।७५।। अच्छे अच्छे देवोंने आकर उसका अभिषेक किया है और उसका निर्मल यश बड़े बड़े पर्वतोंकी शिखरों पर स्थलकमलोंके समान सुशोभित हो रहा है ॥७६॥ गङ्गा-सिन्धु दोनों नदियोंके देवताओं ने रत्नोंके अर्थोके द्वारा उसकी पूजा की है तथा वृषभाचलके तटपर उसने अपना यश टांकीसे उघेर कर लिखा है ॥७७॥ उसने लक्ष्मीको घटदासी अर्थात् पानी भरनेवाली दासीके समान किया है, देव उसके सेवक हो रहे हैं, समस्त रत्न उसके स्वाधीन हैं और निधियाँ उसे धन प्रदान करती रहती हैं।७८।। और उसकी विजयी सेनाओंने समस्त दिशाओंको जीतकर सब समुद्रों के किनारे के वनोंकी भूमिमें भूमण किया है ॥७९॥ हे आयुष्मन्, जगत्में माननीय वही महाराज भरत अपने चक्रवर्तीपनको प्रसिद्ध करते हए कल्याण करनेवाले आशीर्वादसे आपका सन्मान कर आज्ञा कर रहे हैं ॥८०॥ कि समस्त द्वीप और समुद्रों तक फैला हुआ, यह हमारा राज्य हमारे प्रिय भाई बाहुबलीके बिना शोभा नहीं देता है ।।८१।। सम्पत्तियाँ वही हैं, ऐश्वर्य बही है, भोग वही है और सामग्री वही है जिसे भाई लोग सुखके उदयको बाँटते हुए साथ साथ उपभोग करें ॥८२॥ दूसरी एक बात यह है कि आपके प्रणाम करनेसे विमुख रहनेपर जिसमें समस्त मनुष्य, देव, धरणेन्द्र और विद्याधर नमस्कार करते हैं ऐसा उनका चक्रवर्तीपना भी सुशोभित नहीं होता है ।।८३॥ प्रणाम नहीं करनेवाला शत्रु स्वामीके मन को उतना अधिक दुखी नहीं करता है जितना कि अपनेको झूठमूठ चतुर माननेवाला और अभिमानसे प्रणाम नहीं करनेवाला भाई करता है ॥८४॥ इसलिये आप किसी अपराधकी क्षमा नहीं करनेवाले महाराज भरतके समीप जाकर प्रणामके द्वारा उनका सत्कार कीजिये क्योंकि स्वामीको प्रणाम करना अनेक सम्पदाओंको उत्पन्न करनेवाला है और यही सबको इष्ट है ॥८५॥ जिसकी आज्ञा कभी व्यर्थ नहीं जाती ऐसे उस भरतकी आज्ञाका जो कोई भी उल्लंघन करते हैं उन शत्रुओंका शासन करनेवाला उसका वह चक्ररत्न है जिसपर स्वयं किसीका शासन नहीं चल सकता ।।८६।। आप भरतकी आज्ञाका खण्डन करनेसे व्याकुल हुए इन मण्डलाधिपति राजाओंको देखिये जो भयंकर दण्डरूपी वजके गिरनेसे खण्ड खण्ड १ अपूजयताम् । २ गङगासिन्धू देव्यौ। ३ पूजयन् । ४ चक्रिणः । ५ तत्कारणात् । ६ आज्ञाम् । ७ अवज्ञां कुर्वन्ति । ८ शिक्षकम् । दण्डरत्नाशनि। १० पश्यैतान् ब०, अ०, ५०, द०, स०, इ० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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