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________________ त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व १४६ यदिग्भ्रान्तिविमूढेन' महदेनो मयाजितम् । तत्त्वत्सन्दर्शनाल्लीन तमो नशं 'रवेर्यथा ॥१६४॥ त्वत्पदस्मुतिमात्रेण पुमानेति पवित्रताम् । किमुत त्वद्गुणस्तुत्या भक्त्यैवं सुप्रयुक्तया ॥१६॥ भगवंस्त्वद् गुणस्तोत्राद्यन्मया पुण्यमाजितम् । तेनास्तु त्वत्पदाम्भोजे परा भक्तिः सदापि मे ॥१६६॥ वसन्ततिलकावृत्तम् इत्थं चरावरगरुं परमादिदेव स्तुत्वाऽधिराट् धरणिपः सममिद्धबोधः । आनन्दबाष्पलवसिक्तपुरःप्रदेशो भक्त्या ननाम करकुड्मललग्नमौलिः ॥१७॥ श्रुत्वा पुराणपुरुषाच्च पुराणधर्म कर्मारिचक्रजयलब्धविशुद्धबोधात् ।। सम्प्रीतिमाप परमां भरताधिराजः प्रायो धृतिः कृतधियां स्वहितप्रवृत्तौ ॥१६॥ आमुच्छच च स्वगुरुमादिगुरुं निधीशो व्यालोलमौलितटताडितपादपीठः। भूयोऽनुगम्य च मुनीन् प्रणतेन मूर्ना स्वावासभूमिमभिगन्तुमना बभूव ॥१६॥ भक्त्यापितां सजमिवाधिपदं जिनस्य स्वां दृष्टिमन्वितलसत्सुमनोविकासाम् । शेषास्थयैव च पुविनिवर्त्य कृच्छात् चक्राधिपो जिनसभाभवनात्प्रतस्थे ॥२०॥ समस्त लोकको पवित्र करनेवाली आपके चरणोंकी सेवा प्राप्त हुई है ॥१९३॥ हे भगवन्, दिशाभम होनेसे विमूढ होकर अथवा दिग्विजयके लिये अनेक दिशाओंमें भ्रमण करनेके लिये मुग्ध होकर मैंने जो कुछ पाप उपार्जन किया था वह आपके दर्शन मात्रसे उस प्रकार विलीन हो गया है जिस प्रकार कि सूर्यके दर्शनसे रात्रिका अन्धकार विलीन हो जाता है ।।१९४।। हे देव, आपके चरणोंके स्मरणमात्रसे ही जब मनुष्य पवित्रताको प्राप्त हो जाता है तब फिर इस प्रकार भक्तिसे की हुई आपके गुणोंकी स्तुतिसे क्यों नहीं पवित्रताको प्राप्त होगा ? अर्थात् अवश्य ही होगा ॥१९५।। हे भगवन्, आपके गुणोंकी स्तुति करनेसे जो मैंने पुण्य उपार्जन किया है उससे यही चाहता हूं कि आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ॥१९६।। इस प्रकार चर अचर जीवोंके गुरु सर्वोत्कृष्ट भगवान् वृषभदेवको नमस्कार कर जिसने आनन्द के आँसुओंको बुदोंसे सामनेका प्रदेश सींच दिया है, जिसका ज्ञान प्रकाशमान हो रहा है, और जिसने दोनों हाथ जोड़कर अपने मस्तकसे लगा रखे हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने भक्तिपूर्वक भगवान् को नमस्कार किया ।।१९७॥ कर्मरूपी शत्रुओंके समूहको जीतनेसे जिन्हें विशुद्ध ज्ञान प्राप्त हआ है ऐसे पुराण पूरुष भगवान वषभदेवसे पूरातन धर्मका स्वरूप सनकर भरताधिपति महाराज भरत बड़ी प्रसन्नताको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको प्रायः अपना हित करने में ही सन्तोष होता है ॥१९८॥ तदनन्तर अपने चञ्चल मुकुटके किनारेसे जिन्होंने भगवान्के पाद पीठका स्पर्श किया है ऐसे निधियोंके स्वामी भरत महाराज अपने पिता आदिनाथ भगवान्से पूछकर तथा वहाँ विराजमान अन्य मुनियोंको नम हुए मस्तकसे नमस्कार कर अपनी निवासभूमि अयोध्याको जानेके लिये तत्पर हुए ।।१९९।। चक्राधिपति भरतने जिसमें अनुक्रमसे खिले हुए सुन्दर फूल गुधे हुए हैं और जो श्री जिनेन्द्रदेवके चरणोंमें भक्तिपूर्वक अर्पित की गई है ऐसी मालाके समान, सुन्दर मनकी प्रसन्नतासे युक्त अपनी दृष्टिको शेषाक्षत समझ बड़ी कठिनाई से हटाकर भगवान् के सभाभवन अर्थात् समवसरणसे प्रस्थान किया ॥२००। १ दिगविजयभमणमूढ़ेन । २ महत्पापम् । ३ नष्टम् । ४ आदित्यस्य। ५-मजितम् ल० । ६ शोभनमनोविकासाम्, सुपुष्पविकासाञ्च। ७ सिद्धशेषास्थया । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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