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________________ १४८ महापुराणम् नमस्ते प्राप्तकल्याणमहेज्याय महौजसे । प्राज्यत्रैलोक्यराज्याय ज्यायसे ज्यायसामपि ॥१८४॥ नमस्ते नतनाकोन्द्रचूलारत्नाचिताङचये। नमस्ते दुर्जयारातिनिर्जयोपाजितश्रिये ॥१८॥ नमोऽस्तु तुभ्यमिद्धद्ध सपर्यामर्हते' पराम् । रहोरजोरिघाताच्च प्राप्ततनामरूढये ॥१८६॥ जितान्तक नमस्तुभ्यं जितमोह ननोऽस्तु ते । जितानडग नमस्ते स्ताद विरागाय स्वयम्भुवे ॥१८७॥ त्वां नमस्यन्' जननमर्नम्यते सुकृती पुमान् । गां जयज्जितजेत व्यस्त्वज्जयोद्घोषणात्कृती ॥१८॥ त्वत्स्तुते: पूतवागस्मि त्वत्स्मृतेः पुतमानसः । त्वन्नते: पूतदेहोऽस्मि धन्योऽस्म्यद्य त्वदीक्षणात् ॥१८६॥ अहमद्य कृतार्थोऽस्मि जन्माद्य सफलं मम । सुनिर्वृत्ते दशौ मेऽद्य सुप्रसन्नं मनोऽद्य मे ॥१०॥ त्वत्तोर्थसरसि स्वच्छ पुण्यतोयसु सम्भृते । सुस्नातोऽहं चिरादद्य पूतोऽस्मि सुखनिवृतः ॥११॥ त्वत्पादनखभाजालसलिलैरस्तकल्मषैः । अधिमस्तकमालग्नरभिषिक्त इवास्म्यहम् ॥१६२॥ एकतः सार्वभौमश्री: इयमप्रतिशासना । एकतश्च भवत्पादसेवालोकैकपावनी ॥१३॥ उस समय भी देदीप्यमान मुकुटोंको धारण करनेवाले वह्निकुमार देवोंके इन्द्र आपकी पूजा करेंगे इसलिये आपको नमस्कार हो ।।१८३॥ हे नाथ, आपको गर्भ आदि कल्याणकोंके समय बड़ी भारी पूजा प्राप्त हुई है, आप महान् तेजक धारक है, आपको तीन लोकका उत्कृष्ट राज्य प्राप्त हुआ है और आप बड़ोंमें भी बड़े अथवा श्रेष्ठोंमें भी श्रेष्ठ हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१८४।। नमस्कार करते हुए स्वर्गके इन्द्रोंके मुकुटमें लगे हुए मणियोंसे जिनके चरणोंकी पूजा की गई है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो और जिन्होंने कर्मरूपी दुर्जेय शत्रुओंको जीतकर अनन्तचतुष्टयरूपी उत्तम लक्ष्मी प्राप्त की है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८५॥ हे उत्कृष्ट ऋद्धियोंको धारण करनेवाले, आप उत्कृष्ट पूजाके योग्य हैं तथा रहस् अर्थात् अन्तराय रज अर्थात ज्ञानावरण दर्शनावरण और अरि अर्थात मोहनीय कर्मके नष्ट करनेसे आपने 'अरिहन्त' ऐसा सार्थक नाम प्राप्त किया है इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१८६।। हे मृत्युको जीतने वाले, आपको नमस्कार हो। हे मोहको जीतनेवाले, आपको नमस्कार हो। और हे कामको जीतनेवाले, आप वीतराग तथा स्वयंभू हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१८७॥ हे नाथ, जो आपको नमस्कार करता है वह पुण्यात्मा पुरुष अन्य अनेक नम् पुरुषोंके द्वारा नमस्कृत होता है और जो आपके विजयकी घोषणा करता है वह कुशल पुरुष जीतने योग्य समस्त कर्ग कप शत्रुओंको जीतकर गो अर्थात् पृथिवी या वाणीको जीतता है ।।१८८।। हे देव, आज आपकी स्तुति करनेसे मेरे वचन पवित्र हो गये हैं, आपका स्मरण करनेसे मेरा मन पवित्र हो गया है, आपको नमस्कार करनेसे मेरा शरीर पवित्र हो गया है और आपके दर्शन करनेसे मैं धन्य हो गया हूं ॥१८९।। हे भगवन्, आज मैं कृतार्थ हो गया हूं, आज मेरा जन्म सफल हो गया है, आज मेरे नेत्र संतुष्ट हो गये हैं और आज मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया है ।।१९।। हे देव, स्वच्छ और पुण्यरूप जलसे खूब भरे हुए आपके तीर्थरूपी सरोवरमें मैंने चिरकालसे अच्छी तरह स्नान किया है इसीलिये मैं आज पवित्र तथा सुखसे सन्तुष्ट हो रहा है ।।१९।। हे प्रभो, जिसने समस्त पाप नष्ट कर दिये हैं ऐसा जो यह आपके चरणोंके नखोंकी कान्तिका समूहरू प जल मेरे मस्तकपर लग रहा है उससे मैं ऐसा मालूम होता हूं मानो मेरा अभिषेक ही किया गया हो ।।१९२।। हे विभो, एक ओर तो मुझे दूसरेके शासनसे रहित यह चक्रवर्तीकी विभूति प्राप्त हुई है और एक ओर १ पूजायाः योग्याय । २ अन्तरायज्ञानावरणमोहनीयघातात। ३ अर्हन्निति नामप्रसिद्धाय । ४ भवतु। ५ नमस्कुर्वन् । ६ भोजितजेतव्यपक्ष । ७ अत्यन्तसुखवत्यौ। ८ सुखतृप्तः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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