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________________ १४७ प्रयस्त्रिंशत्तम पर्व जय निर्मद निर्माय जय निर्मोह निर्मम । जय निर्मल निर्द्वन्द्व जय निष्कल' पुष्कल ॥१७३॥ जय प्रबुद्ध सन्मार्ग जय दुर्मार्गरोधन । जय कर्मारिमर्माविद्धर्मचक्र जयोद्धर ॥१७४॥ जयाध्वरपते यज्वन् जय पूज्य महोदय । जयोद्धर जयाचिन्त्य' सद्धर्मरथसारथे ॥१७॥ जय निस्तीर्णसंसारपारावारगुणाकर । जय निःशेषनिष्पीतविद्यारत्नाकर प्रभो ॥१७६॥ नमस्ते परमानन्तसुखरूपाय तायिने । नमस्ते परमानन्दमयाय परमात्मने ॥१७७॥ नमस्ते भुवनोभासिज्ञानभाभारभासिने । नमस्ते नयनानन्दिपरमौदरिकत्विषे ॥१७८॥ नमस्ते मस्तकन्यस्तस्वहस्ताञ्जलिकुडमलैः। स्तुताय त्रिदशाधीशैः स्वर्गावतरणोत्सवे ॥१७६।। नमस्ते प्रचलन्मौलिघटिताञ्जलिबन्धनः । नुताय मेरुशलाग्रस्नाताय सुरसत्तमः ॥१८०॥ नमस्ते मुकुटोपापलग्नहस्तपुटोद्भटः । लौकान्तिकरधीष्टाय परिनिष्क्रमणोत्सवे ॥१८१॥ नमस्ते स्वकिरीटानरत्नप्रावान्तचुम्बिभिः । कराब्जमुकुलैः प्राप्तकेवलेज्याय नाकिनाम् ॥१८२॥ नमस्ते पारनिर्वाण कल्याणेऽपि प्रवत्स्य॑ति । पूजनीयाय वह्नीन्द्रज्वलन्मुकुटकोटिभिः ॥१८३॥ वाले, आपकी जय हो। हे जन्मजरारूपी रोगको जीतनेवाले, आपकी जय हो। हे मृत्युको जीतनेवाले, आपकी जय हो ॥१७२।। हे मदरहित, मायारहित, आपकी जय हो। हे मोह रहित, ममतारहित, आपकी जय हो। हे निर्मल और निर्द्वन्द्व, आपकी जय हो । हे शरीररहित, और पूर्ण ज्ञानसहित, आपकी जय हो ॥१७३।। हे समीचीन मार्गको जाननेवाले, आप को जय हो। हे मिथ्या मार्गको रोकनेवाले, आपकी जय हो। हे कर्मरूपी शत्रुओंके मर्मको वेधन करनेवाले, आपकी जय हो। हे धर्मचक्रके द्वारा विजय प्राप्त करने में उत्कट, आपकी जय हो ॥१७४॥ हे यज्ञके अधिपति, आपकी जय हो। हे कर्मरूप ई धनको ध्यानरूप अग्नि में होम करनेवाले, आपकी जय हो। हे पूज्य तथा महान् वैभवको धारण करनेवाले, आपकी जय हो। हे उत्कृष्ट दयारूप चिह्नसे सहित तथा हे समीचीन धर्मरूपी रथके सारथि, आपकी जय हो ।।१७५।। हे संसाररूपी समुद्रको पार करनेवाले, हे गुणोंकी खानि, आपकी जय हो । हे समस्त विद्यारूपी समुद्रका पान करनेवाले, हे प्रभो, आपकी जय हो ॥१७६।। आप उत्कृष्ट अनन्त सुखरूप हैं तथा सबकी रक्षा करनेवाले हैं इसलिये आपको नमस्कार हो। आप परम आनन्दमय और परमात्मा हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१७७॥ आप समस्त लोकको प्रकाशित करनेवाले ज्ञानकी दीप्तिके समहसे देदीप्यमान हो रहे हैं इसलिये आपको नमस्कार हो। आपके परमौदारिक शरीरकी कान्ति नेत्रोंको आनन्द देनेवाली है इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१७८॥ हे देव, स्वर्गावतरण अर्थात् गर्भकल्याणकके उत्सवके समय इन्द्रोंने अपने हाथों की अञ्जलिरूपी बिना खिले कमल अपने मस्तकपर रखकर आपकी स्तुति की थी इसलिये आपको नमस्कार हो ।।१७९॥ अपने नम हुए मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर रखनेवाले उत्तम उत्तम देवोंने जिनकी स्तुति की है तथा सुमेरु पर्वतके अग्रभागपर जिनका जन्माभिषेक किया गया है ऐसे आपके लिये नमस्कार है ॥१८०॥ दीक्षाकल्याणकके उत्सवके समय अपने मकट के समीप ही हाथ जोड़कर लगा रखनेवाले लौकान्तिक देवोंने जिनका अधिष्ठान अर्थात् स्तुति की है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८१॥ अपने मुकुटके अग्रभागमें लगे हुए रत्नोंका चुम्बन करनेवाले देवोंके हाथरूपी मुकुलित कमलोंके द्वारा जिनके केवलज्ञानकी पूजा की गई है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८२।। हे भगवन्, जब आपका मोक्षकल्याणक होगा १शरीरबन्धनरहित । २ मर्म विध्यति ताडयतीति मर्मावित् तस्य सम्बुद्धिः। 'नहिव तिवृषि ध्यधिसहितनिरुचि क्वी कारकस्यति' दीर्घः। ३ उद्भट । ४ दयाचिन्ह द०, ल०, इ०, अ०, ५०, स०। ५ पालकाय । ६ ज्ञानकिरणसमूहप्रकाशिने । ७ स्तुताय । ८ भूमद्भिः समथैः वा । ६ अधिकमिष्टाय सत्कारानुमतायेत्यर्थः । १० भाविनि । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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