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________________ प्रयस्त्रिंशत्तम पर्व १४५ दिव्यभाषा तवाशेषभाषा भेदानकारिणी। निरस्यति मनोवान्तम् अवाचामपि देहिनाम् ॥१४८॥ प्रातिहार्यमयी भूतिः इयमष्टतयो प्रभो। महिमानं तवाचष्टे विस्पष्टं विष्टपातिगम् ॥१४॥ त्रिमेखलस्य पीठस्य मेरोरिव गरीयसः । चलिकेव विभात्य च्चैः सेव्या गन्धकुटी तव ॥१५०॥ वन्दारूणां मुनीन्द्राणां स्तोत्रप्रतिरवैमहः । स्तोतुकामेव भक्त्या त्वां सैषा भात्यतिसंमदात् ॥१५॥ परार्घ्यरत्ननिर्माणाम् एनामत्यन्तभास्वरान् । त्वामध्यासीनमानमा नाकभाजो भजन्त्यमी ॥१५२॥ सशिखामणयोऽमीषां नम्राणां भान्ति मौलयः । सदीपा इव रत्नार्धाः स्थापितास्त्वत्पदान्तिके ॥१५३॥ नतानां सुरकोटीनां वकासत्यधिमस्तकम् । प्रसादांशा इवालग्ना युष्मत्पादनखांशवः ॥१५४॥ नखदर्पणसंक्रान्तबिम्बान्यमरयोषिताम् । दधत्यसूनि वक्त्राणि त्वदुपाडयम्बु जश्रियम् ॥१५॥ वक्त्रेष्वमरनारीणां सन्धत्त कुडकुमश्रियम् । युष्मत्पादतलच्छाया प्रसरंती जयाऽरुणा ॥१५६॥ गणाध्युषित भूभागमध्यवर्ती त्रिमेखतः। पीठाद्रिरयमाभाति तवानिष्कृतमङगलः ॥१५७॥ प्रथमोऽस्य परिक्षेपो धर्मचरलङकृतः। द्वितीयोऽपि तवाऽमीभिः दिक्ष्वष्टासु महाध्वजः॥१५८।। श्रीमण्डपनिवेशस्ते योजनप्रमितोऽप्ययम् । निजगज्जनताऽजलप्रावेशोपग्रहक्षमः ॥१५॥ धूलीसालपरिक्षेपो मानस्तम्भाः सरांसि च । खातिका सलिलापूर्णा कल्लीवनपरिच्छदः ॥१६०॥ आपके भामण्डलकी प्रभा सभाके चारो ओर फैल रही है ॥१४७॥ समस्त भाषाओंके भेदोंका अनुकरण करनेवाली अर्थात् समस्त भाषाओं रूप परिणत होनेवाली आपकी यह दिव्य ध्वनि जो वचन नहीं बोल सकते ऐसे पशु पक्षी आदि तिर्यञ्चोंके भी हृदयके अन्धकारको दूर कर देती है ।।१४८।। हे प्रभो, आपकी यह प्रातिहार्यरूप आठ प्रकारकी विभूति आपकी लोकोत्तर महिमाको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है ।।१४९॥ मेरु पर्वतके समान ऊंचे तीन कटनीदार पीठपर सबके द्वारा सेवन करने योग्य आपकी यह ऊँची गन्धकुटी मेरुकी चूलिकाके समान सुशोभित हो रही है ।।१५०।। वन्दना करनेवाले उत्तम मुनियोंके स्तोत्रोंकी प्रतिध्वनिसे यह गन्धकटी ऐसी जान पड़ती है मानो भक्तिवश हर्षसे आपकी स्तुति ही करना चाहती हो ॥१५॥ हे प्रभो, जो श्रेष्ट रत्नोंसे बनी हुई और अतिशय देदीप्यमान इस गन्धकुटीमें विराजमान हैं ऐसे आपकी, स्वर्ग में रहनेवाले देव नम होकर सेवा कर रहे हैं ॥१५२।। हे देव, जो अग्रभागमें लगे हुए मणियोंसे सहित हैं ऐसे इन नमस्कार करते हुए देवोंके मुकुट ऐसे जान पड़ते हैं मानो आपके चरणोंके समीप दीपकसहित रत्नोंके अर्थ ही स्थापित किये गये हों ॥१५३॥ नमस्कार करते हुए करोड़ों देवोंके मस्तकोंपर जो आपके चरणोंके नखोकी किरणें पड़ रही थीं वे ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो उनपर प्रसन्नताके अंश ही लग रहे हों ॥१५४॥ आपके नखरूपी दर्पणमें जिनका प्रतिविम्ब पड़ रहा है ऐसे ये देवांगनाओंके मुख आपके चरणोंके समीपमें कमलोंकी शोभा धारण कर रहे हैं ॥१५५॥ जवाके फुलके समान लाल वर्ण जो यह आपके पैरोंके तलवोंकी कान्ति फैल रही है वह देवांगनाओंके सुखोंपर कुडकुमकी शोभा धारण कर रही है ।।१५६।। जो बारह सभाओंसे भरी हुई पृथिवीके मध्यभागमें वर्तमान है और जिसपर अनेक मङगल द्रव्य प्रकट हो रहे हैं ऐसा यह तीन कटनीदार आपका पीठरूपी पर्वत बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ।। १५७।। इस पीठकी पहली परिधि धर्मचक्रोंसे अलंकृत है और दूसरी परिधि भी आठों दिशाओं में फहराती हुई आपकी इन बडी बडी ध्वजाओंसे सशोभित है ।।१५८।। यद्यपि आपके श्रीमण्डपकी रचना एक ही योजन लम्बी-चौड़ी है तथापि वह तीनों जगत्के जनसमूहके निरन्तर प्रवेश कराते रहने रूप उपकार में समर्थ हैं ॥१५९॥ हे प्रभो, यह धूलोसाल की परिधि, ये मानस्तम्भ, सरोवर, स्वच्छ जलसे भरी हुई परिखा, लता १ तिरश्चाम् । २ तव पादसमीपे। ३ द्वादशगणस्थित। ४ उपकारदक्षः। 'त्रिजगज्जनानां स्थानदाने समर्थ इत्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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