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________________ १४४ महापुराणम् यथान्धतमसे दूरात्त ते विरुतैः शिखी' । तथा त्वमपि सुव्यक्तैः सूफ्तराप्तोक्तिमर्हसि ॥१३६॥ प्रास्तामाध्यात्मिकीयं ते ज्ञानसंपन्महोदया। बहिविभूतिरेवैषा शास्ति नः शास्तृतां त्वयि ॥१४०॥ परार्घमासनं सैहं कल्पितं सरशिल्पिभिः। रत्नरुकछरितं भाति तावक मेरुऋडगवत् ॥१४॥ 'सुरैरुच्छितमेतत्ते छत्राणां त्रयमूजितम् । त्रिजगत्प्राभ चिह्नं न प्रतीमः कथं वयम् ॥१४२॥ चामराणि तवामूनि वीज्यमानानि चामरः। शंसन्त्यनन्यसामान्यम् ऐश्वर्य भुवनातिगम् ॥१४३॥ परितस्त्वत्सभां देव वर्षन्त्येते सुराम्बुदाः । सुमनोवर्षमुद्गन्धि व्याहूतमधुपव्रजम् ॥१४४॥ सुरदुन्दुभयो मन्द्रं ध्वनन्त्येते नभोऽङगणे । सुरकिङकरहस्ताग्रताडितास्त्वज्जयोत्सवे ॥१४॥ सुरैरासेवितोपान्तो जनताशोकतापनुत् । प्रायस्त्वामयमन्वेति तवाशोकमहोरुहः ॥१४६॥ त्वदेहदीप्तयो दीप्राः प्रसरन्त्यभितः सभाम् । धृतबालातपच्छायास्तन्वाना नयनोत्सवम् ॥१४७॥ बीचमें जिसकी समस्त किरणें छिप गई हैं ऐसा सूर्य यद्यपि दिखाई नहीं देता तथापि फूले हुए कमलोंसे उसका अस्तित्व सूचित हो जाता है उसी प्रकार आपका प्रत्यक्ष रूप भी दिखाई नहीं देता तथापि आपके श्रेष्ठ वचनोंके वैभवके द्वारा आपके प्रत्यक्ष रूपका अस्तित्व सूचित हो रहा है । भावार्थ-आपके महान् उपदेश ही आपको सर्वज्ञ सिद्ध कर रहे हैं ॥१३८॥ अथवा जिस प्रकार सघन अन्धकारमें यद्यपि मयूर दिखाई नहीं देता तथापि अपने शब्दोंके द्वारा दूर से ही पहिचान लिया जाता है उसी प्रकार आपका आप्तपना यद्यपि प्रकट नहीं दिखाई देता तथापि आप अपने स्पष्ट और सत्यार्थ वचनोंसे आप्त कहलानेके योग्य हैं ॥१३९।। अथवा हे देव, जिसका बड़ा भारी अभ्युदय है ऐसी यह आपकी अध्यात्मसम्बन्धी ज्ञानरूपी सम्पत्ति दूर रहे, आपकी यह बाह्य विभूति ही हम लोगोंको आपके हितोपदेशीपनका उपदेश दे रही है । भावार्थ-आपकी बाह्य विभूति ही हमें बतला रही है कि आप मोक्षमार्गरूप हितका उपदेश देनेवाले सच्चे वक्ता और आप्त हैं ॥१४०॥ हे भगवन्, देवरूप कारीगरोंके द्वारा बनाया हुआ और रत्नोंकी किरणोंसे मिला हुआ आपका यह श्रेष्ठ सिंहासन मेरु पर्वतकी शिखर के समान सुशोभित हो रहा है ।।१४१॥ देवोंके द्वारा ऊपरकी ओर धारण किया हुआ यह आपका प्रकाशमान छत्रत्रय आपकी तीनों लोकोंकी प्रभुताका चिह्न है ऐसा हम क्यों न विश्वास करें ? भावार्थ-आपके मस्तकके ऊपर आकाशमें जो देवोंने तीन छत्र लगा रखे हैं वे ऐसे मालूम होते हैं मानो आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं यही सूचित कर रहे हों ।।१४२॥ देवोंके द्वारा ढुलाये हुए ये चमर तीनों जगत्को उल्लंघन करनेवाले आपके असाधारण ऐश्वर्यको सूचित कर रहे है ॥१४३॥ हे देव, ये देवरूपी मेघ आपकी सभाके चारों ओर अत्यन्त सुगन्धित तथा भूमरोक समूहको बुलानेवाली फलोंकी वर्षा कर रहे हैं ।।१४४।। हे प्रभो, आपक विजयोत्सवमें देवरूप किंकरोंके हाथोंके अग्र भागसे ताड़ित हुए ये देवोंके दुन्दुभि बाजे आकाश रूप आंगनमें गम्भीर शब्द कर रहे हैं ॥१४५॥ जिसका समीप भाग देवोंके द्वारा सेवित है अर्थात् जिसके समीप देव लोग बैठे हुए हैं और जो जनसमूहके शोक तथा संतापको दूर करने वाला है ऐसा यह अशोकवृक्ष प्रायः आपका ही अनकरण कर रहा है क्योंकि आपका समीप भाग भी देवोंके द्वारा सेवित है और आप भी जनसमूहके शोक और संतापको दूर करनेवाले हैं ॥१४६॥ जिसने प्रातःकालके सूर्यकी कान्ति धारण की है और जो नेत्रोंका उत्सव बढ़ा रही है ऐसी यह आपके शरीरकी देदीप्यमान कान्ति सभाके चारों ओर फैल रही है। भावार्थ १ बहि। २ श्रुतेर्योग्यो भवसि । ३ शिक्षकत्वम् । ४ रत्नकान्तिमिश्रितम् । ५ त्वत्सम्बन्धि । ६ देवरुद्धृतम् । ७ त्रैलोक्यप्रभुत्वे । ८ कथं न विश्वासं कुर्मः। नदन्त्येते ल० । १० सन्तापहारि । ११ अनुकरोति । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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