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________________ १२६ महापुराणम् प्रसाधितदिशो यस्य यशः शशिकलामलम् । सुरैरसकृदुद्गीतं कुलक्षोणीघ्रकुक्षिषु ॥१५॥ दिग्जय यस्य सैन्यानि विश्रान्तान्यधिदिक्तटम् । चक्रानुभान्तितान्तानि' क्रान्त्वा हमवतीस्थलीः॥१५२॥ नप्ता श्रीनाभिराजस्य पुत्रः श्रीवृषभेशिनः । षट्पण्डमण्डितामेनां यः स्म शास्त्यखिलां महीम् ॥१५३॥ मत्वाऽसौ गत्वरों लक्ष्मी जित्वरः सर्वभूभृताम् । जगद्विसत्वरी' कोत्तिम् अतिष्ठिपदिहाचले ॥१५४॥ इति प्रशस्तिमालीयां विलिखन् स्वयमक्षरैः। प्रसूनप्रकरैर्मुक्तः नपोऽवचकिरेऽमरः ॥१५॥ तत्रोच्चरुच्चरद्ध्वानामन्द्रदुन्दुभयोऽध्वनन् । दिवि देवा जयेत्याशी शताप्युच्चरघोषयन् ॥१५६॥ स्वर्धनीसीकरासारवाहिनो गन्धवाहिनः। मन्दं विचेरुराधूत सान्द्रमन्दारनन्दनाः ॥१५७॥ न केवल शिलाभित्तौ अस्य नामाक्षरावली । लिखितानेन चान्द्रऽपि बिम्बे तल्लाञ्छनच्छलात् ॥१५८॥ लिखितं साक्षिणे भुक्तिरित्यस्तीहापि शासने । लिखितं सोऽचलो भुक्तिः दिग्जय साक्षिणोऽमराः ॥१५॥ अहो महानुभावोऽयं चक्री दिवचक्रनिर्जये। येनाक्रान्तं महीचक्रम् प्रानक्रवसतित्रिकात् ॥१६०॥ खचरादिरलंध्योऽपि हेलयालंघितोऽमुना। कीतिः स्थलाडिजनीवास्य रूढा हमाचलस्थले ॥१६१॥ हैं, जिसकी दिग्विजयके समय चारों ओर उठी हुई कबूतरके गलेके समान कुछ कुछ मलिन सेनाकी धूलिसे समस्त दिशाओंके साथ साथ आकाश भर जाता है, समस्त दिशाओंको वश करनेवाले जिसका चन्द्रमाकी कलाओंके समान निर्मल यश कुलपर्वतोंके मध्यभागमें देव लोग बारबार गाते हैं, दिग्विजयके समय चक्रके पीछे पीछे चलनेसे थकी हुई जिसकी सेनाओंने हिमवान् पर्वतकी तराईको उल्लंघन कर दिशाओंके अन्तभागमें विश्राम लिया है, जो श्री नाभिराजका पौत्र है, श्री वृषभदेवका पुत्र है, जिसने छह खण्डोंसे सुशोभित इस समस्त पृथिवीका पालन किया जो समस्त राजाओंको जीतनेवाला है ऐसे मुझ भरतने लक्ष्मीको नश्वर समझकर जगत्में फैलनेवाली अपनी कीर्तिको इस पर्वतपर स्थापित किया है ॥१४६-१५४॥ इस प्रकार चक्रवर्तीने अपनी प्रशस्ति स्वयं अक्षरोंके द्वारा लिखी, जिस समय चक्रवर्ती उक्त प्रशस्ति लिख रहे थे उस समय देव लोग उनपर फूलोंकी वर्षा कर रहे थे ।।१५५॥ वहाँ जोर जोरसे शब्द करते हुए गम्भीर नगाड़े बज रहे थे, आकाशमें देव लोग जय जय इस प्रकार सैकड़ों आशीवर्वाद रूप शब्दोंका उच्चारण कर रहे थे ॥१५६।। और गङ्गा नदीके जलकी बूंदोंके समूह को धारण करता हुआ तथा कल्पवृक्षोंके सघन वनको हिलाता हुआ वायु धीरे धीरे बह रहा था ॥१५७॥ भरतके नामके अक्षरोंकी पंक्ति केवल शिलाकी दीवालपर ही नहीं लिखी गई थी किन्तु उन्होंने काले चिन्हके बहानेसे चन्द्रमाके मण्डलमें भी लिख दी थी। भावार्थ-चन्द्रमा के मण्डलमें जो काला काला चिह्न दिखाई देता है वह उसका चिह्न नहीं है, किन्तु भरतके नामके अक्षरोंकी पंक्ति ही है, यहां कविने अपह्नति अलंकारका आश्रय लेकर वर्णन किया है ॥१५८॥ अन्य प्रशस्तियोंके समान भरतकी इस प्रशस्तिमें भी लेख, साक्षी और उपभोग करने योग्य क्षेत्र ये तोनों ही बातें थीं क्योंकि लेख तो वृषभाचलपर लिखा ही गया था, दिग्विजय करनेसे छह खण्ड भरत उपभोग करने योग्य क्षेत्र था और देव लोग साक्षी थे ॥१५९।। अहा , यह चक्रवर्ती बड़ा प्रतापी है क्योंकि इसने समस्त दिशाओंको जीतते समय पूर्व पश्चिम और दक्षिणके तीनों समुद्रपर्यन्त समस्त भुमण्डलपर आक्रमण किया है-समस्त भरत को अपने वश कर लिया है । यद्यपि विजयार्ध पर्वत उल्लंघन करने योग्य नहीं है तथापि इसने १ चक्रानगमनेन भिन्नानि । २ गमनशीलाम । ३ जयनशीलः । ४ विसरणशीलाम् । ५ ालखत् ल०, अ०, द०, स०। ६ आकीर्णः। ७-राध्मात ल०। ८ पत्रम् । पूर्वदक्षिणपश्चिमसमुद्रपर्यन्तम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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