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________________ द्वात्रिंशत्तमं पर्व अधितमस्यासीच्छभित्तिषु चक्रिणः । स्वनामाक्षरविन्यासे धृति विश्वक्षमाजितः ॥ १४०॥ काकिणीरत्नमादाय यदा लिलिखिषत्ययम् । तदा राजसहस्राणां नामान्यत्रैशताधिराट् ॥ १४१ ॥ असंख्यकल्पकोटी येऽतिक्रान्ता धराभुजः । तेषां नामभिराकीर्ण तं पश्यन् स सिसिध्मये ॥१४२॥ ततः किञ्चित् स्खलद्गर्यो दिलक्षीभूय चक्रिराट् । अनन्यशासनामेनां न मेने भरतावनीम् ॥ १४३ ॥ स्वयं कचिदेकस्य निरस्यलामशासनम् । स मे निखिलं लोकं प्रायः स्वार्थपरायणम् ॥१४४॥ श्रथ तत्र शिलापट्टे स्वहस्ततलनिस्तलें । प्रशस्तिमित्युदात्तार्थं व्यलिखत् स यशोधनः ॥ १४५ ॥ स्वाकुकुल व्योमतलप्रालेयदीधितिः । चातुरन्त महीभर्ता' भरतः शातमातुः ॥१४६॥ श्रीमान निःशेषणचरामरभूचरः । प्राजापत्यो" मनुमन्यः शूरः शुचिरुदारधीः ॥ १४७॥ चांगधरी धोरो धौरेयश्चक" धारिणाम् । परिक्रान्तं धराच जिष्णुना येन दिग्जये ॥ १४८ ॥ यस्यादशकोटयोऽश्वा जलस्थलविलङधिनः । लक्षाश्चतुरशीतिश्च मदेभा जयसाधने ॥१४६॥ यस्य दिग्विजय विष्वग्वल रेणुभिरुत्थितैः । सदिडामुखं खमारुद्ध कपोलगलकर्बुरैः ।। १५० ।। निर्मल और विजयलक्ष्मी के मुख देखने के लिये मंगलमय दर्पणके समान उस वृषभाचलके किनारे की दीवाले भरतका मन हरण कर रही थीं ।। १३९ || समस्त पृथिवीको जीतनेवाले चक्रवर्ती भरतको उस पर्वतके किनारेकी शिलाकी दीवालोंपर अपने नामके अक्षर लिखने में बहुत कुछ संतोष हुआ था ।। १४०॥ चक्रवर्ती भरतने काकिणी रत्न लेकर ज्योंही वहाँ कुछ लिखनेकी इच्छा की त्योंही उन्होंने वहाँ लिखे हुए हजारों चक्रवर्ती राजाओंके नाम देखे || १४१ ।। असंख्यात करोड़ कल्पोंमें जो चक्रवर्ती हुए थे उन सबके नामोंसे भरे हुए उस वृपभाचलको देखकर भरत को बहुत ही विस्मय हुआ || १४२॥ तदनन्तर जिसका कुछ अभिमान दूर हुआ है ऐसे चक्रवर्ती ने आश्चर्यचकित होकर इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीको अनन्यशासन अर्थात् जिसपर दूसरेका शासन न चलता हो ऐसा नहीं माना था । भावार्थ- वृषभाचलकी दीवालोंपर असंख्यात चक्रवर्तियों के नाम लिखे हुए देखकर भरतका सब अभिमान नष्ट हो गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीपर मेरे समान अनेक शक्तिशाली राजा हो गये हैं ।। १४३ ॥ चक्रवर्ती भरतने किसी एक चक्रवर्तीके नामकी प्रशस्तिको स्वयं अपने हाथसे मिटाया और वैसा करते हुए उन्होंने प्रायः समस्त संसारको स्वार्थपरायण समझा ।। १४४ ।। अथानन्तर - यश ही जिसका धन है ऐसे चक्रवर्तीने अपने हाथके तलभागके समान चिकने उस शिलापट्टपर नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट अर्थसे भरी हुई प्रशस्ति लिखी ।। १४५ ।। स्वस्ति श्री इक्ष्वाकु वंशरूपी आकाशका चन्द्रमा और चारों दिशाओंकी पृथिवीका स्वामी में भरत हूँ, मैं अपनी माताके सौ पुत्रों में से एक बड़ा पुत्र हूँ, श्रीमान् हूँ, मैंने समस्त विद्याधर देव और भूमिगोचरी राजाओंको नम्रीभूत किया है, प्रजापति भगवान् वृषभदेवका पुत्र हूँ, न हूं, मान्य हूँ, शूरवीर हूँ, पवित्र हूँ, उत्कृष्ट बुद्धिका धारक हूँ, चरमशरीरी हूँ, धीर वीर हूँ चक्रवर्तियों में प्रथम हूँ और इसके सिवाय जिस विजयीने दिग्विजयके समय समस्त पृथिवीमण्डल की परिक्रमा दी है अर्थात् समस्त पृथिवीमण्डलपर आक्रमण किया है, जिसके जल और स्थल में चलनेवाले अठारह करोड़ घोड़े हैं, जिसकी विजयी सेनामें चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी १२५ १ सन्तोषः । २ सफल महीविजयिनः । ३ लिखितुमिच्छति । ४ अपरिमितानां राज्ञामित्यर्थः । ५. विस्मयान्वितो भूत्वा । 'विक्षो विस्मयान्विते' इत्यभिधानात् । ६ वर्तुले समतले इत्यर्थः । ७ चतुरन्तो द०, प०, इ० अ० स० । त्रिसमुद्र - हिमवगिरिपर्यन्तमहीनाथः । शतस्य माता शतमाता तस्या अपत्यं शातमातुरः । १० प्रजापतेः पुरोरपत्यं पुमान् । ११ मुख्यः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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