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________________ णाण जगमसेसं (णाण) 1/1 [(जग)+(असेस)] जगं (जग) 2/1 असेसं (असेस) 2/1 वि = ज्ञान = विश्व को = समस्त 3. विज्जा. भत्तिवंतस्स सिद्धिमुवयादि (विज्जा) 1/1 = विद्या. अव्यय = भी (भत्तिवंत) 6/1 = भक्तिवान की [(सिद्धिं) + (उवयादि)] सिद्धिं (सिद्धि) 2/1 = सिद्धि को, उवयादि (उवया) व 3/1 सक = प्राप्त होती है (हो) व 3/1 अक = होती है (सफला) 1/1 वि = सफल अव्यय = और होदि सफला किह अव्यय - कैसे पुण णिव्वुदिबीजं सिज्झहिदि अभत्तिमंतस्स अव्यय [(णिव्वुदि)-(बीज) 1/1] · (सिज्झ) भ 3/1 अक (अभत्तिमंत) 4/1 = फिर = मोक्ष रूपी बीज = सिद्ध होगा = अभक्तिवान के लिए णाणुज्जोएण' (णाण) + (उज्जोएण)] [(णाण)-(उज्जोय) 3/1] विणा - अव्यय । (ज) 1/1 स ‘इच्छदि. (इच्छ) व 3/1 सक मोक्खमग्गमुवगन्तुं [(मोक्ख)+ (मग्गं) + (उवगन्तुं)] [(मोक्ख)-(मग्ग) 2/1] (उवगन्तुं) हेकृ अनि (गन्तुं) हेकृ अनि . = ज्ञान रूपी प्रकाश के = बिना = जो (व्यक्ति) = इच्छा करता है = मोक्ष-मार्ग को = जाने के लिए = जाने के लिए 1. बिना के योग में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। प्राकृत गद्य-पद्य सौरभ भाग - 2 157 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002692
Book TitlePrakrit Gadya Padya Saurabh Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year2005
Total Pages192
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size8 MB
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