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पाँचवाँ अधिकार/८१
दोहा । प्रजा बनारस नगरकी, नागर नीत सुजान ।। चार रतनके पारखी, लहिये घर घर थान ।।६१।। देव धर्म गुरु ग्रंथ ये, बड़े रतन संसार || इनकौं परखि प्रमानिये, यह नर-भव-फल सार ||६२।। जे इनकी जानें परख, ते जग लोचनवान || जिनकौं यह सुधि ना परी, ते नर अंध अजान ||६३।। लोचनहीने पुरुषकौं, अंध न कहिये भूल || उर-लोचन जिनके मुँदे, ते आंधे निर्मूल ॥६४||
__ चौपाई। इहि बिध नगर बसै बहु भाय । सब सोभा बरनी नहिं जाय || अस्वसेन भूपति बड़-भाग | राज करै तहाँ अतुल सुहाग ||६५।। कासिप गोत्र जगत परसंस । बंस-इख्वाक-विमल-सर-हंस ।। तेजवंत दिनपति ज्यौं दिपै । प्रभुता देखि सचीपति छिपै ॥६६॥ कलप-तरोवर सम दातार | रतिपति लाजै रूप निहार || रयनायर सम अति गंभीर । पर्वतराज बराबर धीर ||६७।। सोम समान सबनि सुखदाय । कीरति-किरन रही जग छाय || तीन ग्यान संजुगत सुजान | परम विवेकी दया-निधान ।।६८।। जिनपद भक्ति धर्म-धन-वास । गुरु-सेवा-रति नीति-निवास ।। कला-चातुरी-बुधि-विग्यान । विद्या-विनय-संपदा-थान ||६९।। सकल सार गुण-मानिक-कोष । उभय पच्छ निर्मल निर्दोष ।। जिन-सूरज उदयाचल राय । तिस महिमा बरनी किमि जाय ||७०|| . वामादेवी नाम पवित्त । तिनके घर रानी सुभ चित || निरुपम लावन सब गुन-भरी । रूप-जलधि बेला अवतरी ||७१।।
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