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८०/पार्श्वपुराण
केई श्रावक-के व्रत पाल । अच्युत स्वर्ग बसैं चिरकाल || केई कर जिनजग्य विधान । पावै पुन्नी अमर-विमान ॥४९।। केई मुनि वरदान प्रभाव | भोगैं भोगभूमिकी आव || अति पुनीत सब ही विध देस । जहां जनम चाहैं अमरेस ||५०।। तहां बनारस नगरी बसे । देखत सुर-नर-मन हुल्लसै ।। है प्रसिद्ध धरनीपर सोय । तीरथराज कहैं सब कोय ||५१।। सोभा जाकी कही न जाय । नाम लेत रसना सुचि थाय ।। जहां सरोवर नाना भांति । जिनके तीर तरोवर पाँति ||५२।। निजजीवन जीवन सुख देहिं । कमल-सुवास सिलीमुख लेहिं ।। सोहैं सघन रवाने बाग । फले फूल फल बढ्यौ सुहाग ||५३।। सजल खातिका राजै खरी । उटै लहरि लोयन-गति-हरी ।। कोट उतंग कांगुरे लसैं । मानौं सुरग लोक दिस हँसैं ||५४|| ऊँचे महल मनोहर लगें । सुवरन कलस सिखर जगमगैं ।। अति उन्नत जिन-मंदिर जहां । तिन महिमा वरनन बुध कहां ।।५५।। रतनबिंब राजै जिहि माहिं । सिखर सुरंग धुजा फहराहिं ।। कंचनके उपकरन समाज | आवै भविजन पूजाकाज ||५६।। जय जय सब्द सहित छबि छजै । किधौं धर्म-रयनायर गजै ।। नगरनारि नित बंदन जाहिं । जिन दरसन उच्छव उरमाहिं ।।५७।। भूषनभूषित सुंदर देह । मानौं सुभग अपछरा येह ।। सब गृहस्थ साधै षट कर्म । पालै प्रजा अहिंसा धर्म ||५८|| दोष अठारह वर्जित देव । तिस प्रभुकौं पूजै बहु भेव ।। चाह-चिहन-वरजित जो धीर । सोई गुरु से0 वरबीर ||५९।। आदि अंत जे विगत विरोध । तेई ग्रंथ सुनैं मन सोध ।। सत्य सील गुन पालैं सदा । तातें लोग सुखी सर्वदा ||६०||
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