SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 185
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५४ २४. गुरु-उपासना ४. आदर्श उपासना खुल जाने के कारण मार्ग सरल बन जाता है, परन्तु जीवन को प्रेरणा देने वाला उपदेश वचनों से नहीं स्वयं उनके जीवन से लिया जाता है। शाब्दिक उपदेश हम शास्त्र में भी पढ़ सकते हैं पर जीवित उपदेश हमें गुरु के सिवाय कहीं अन्यत्र उपलब्ध नहीं हो सकता । इसलिये गुरु-उपासना है दूसरा पग जो कि इस मार्ग का बड़ा आवश्यक अंग है। ४. आदर्श उपासना मेरी भांति उन गुरुओं ने भी प्रथम पग देव-पूजा में ही रखा था। उसके कारण हृदय लोक में प्रवेश हो जाने पर उन्हें समता का परिचय मिला और साथ-साथ उन्होने अपने अन्दर से आती हई यह गर्जना भी सुनी कि “प्रभु ! तू सिंह है, सिंह की सन्तान है, त्रिलोकाधिपति है, अपने को पामर व कायर मत समझ, अपनी जाति को पहिचान, जिनका तू उपासक बना है वही तू है।" उससे ही जागृति मिली और बन गये वीर, इन्द्रिय-विजयी । ऐसा वीरत्व अपने अन्दर जागृत करने के लिये ही गुरु-उपासना की प्रधानता है। गुरु-उपासना का अर्थ गुरु के पांव दबा देना या उनकी झूठी प्रशंसा करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करना मात्र नहीं है, इसका आन्तरिक अर्थ कुछ और है। उपासना कहते हैं 'उप+ आसन' अर्थात् निकट में बैठना । गुरु-उपासना का अर्थ हुआ गुरु के निकट बैठना, गुरुदेव की आन्तरिक शान्ति के निकट बैठना, उनकी समता के निकट बैठना, उनकी वीतरागता के निकट बैठना । धन्य है प्रभु आपका जीवन, आपके पास गृहस्थ दशा में सब कुछ होते हुये भी आपने उसकी ओर चित्त न लगाया । वास्तव में आपने तत्त्व को समझा। मुझ पामर का भी उद्वार कीजिये, वही भावना मेरे अन्दर भी भर दीजिये । (वस्तुत: भावना ये नहीं भरेंगे, परन्तु भक्ति के आवेश में उनके प्रति बहुमान होने से ऐसे शब्द निकल ही जाया करते है) (दे० २३/६.४)। गृहस्थ में आप अपने को सन्तान का सहायक मान रहे थे, परन्तु कितनी जल्दी छोड दी आपने वह धारणा? मेरा भी यह भ्रम दूर कर दीजिए प्रभु । आपने इस संसार से दूर एक नया संसार बसाया है । कितना सुन्दर है यह संसार जहाँ शान्ति-सुन्दरी के साथ आप किलोल कर रहे हैं, जहाँ इस सुन्दरी की कोख से आपके सन्तति उत्पन्न हुई है, निष्कपटता, निष्कषायता तथा अन्य अनेकों सदगुण? मुझे भी वहीं ले चलिए प्रभु । कितने स्वतन्त्र हैं आप? न है वस्त्र की आवश्यकता, न धन की चाह, न किसी सहायता की अपेक्षा, न इन्द्रादि पदों की इच्छा । धन्य है आपकी स्वतन्त्रता, धन्य है आपकी निर्भयता, धन्य है आपकी साम्यता। सख-दख में तथा अनकलता-प्रतिकलता में सदा समान भाव, सदैव अपने को ही निहारना । मुझ पर भी करुणा कीजिये नाथ, यह भाव व शक्ति मुझे भी प्रदान कीजिये। देखिये भगवन् ! आपका वीर्य कितना बढ़ा हुआ है कि आपने कुटुम्बादि से ममत्व छोड़ा तो छोड़ा परन्तु इससे भी आगे आपने तो मेरे इस सन्देह को कि 'क्या गर्मी सर्दी आदि की बाधायें सहन करने को मैं समर्थ हो सकूँगा' दूर करके यह सिद्ध कर दिया कि मै अवश्य सहन कर सकूँगा। आप धन्य हैं परन्तु इससे मेरे जीवन को कुछ प्रेरणा मिले तभी तो यह 'धन्य धन्य है। आज के लोगों को सम्भवत: यह भ्रम होता है कि दिशाओं मात्र को वस्त्र-स करके आकाश की खुली छत के नीचे, गर्मी सर्दी आदि की अनेकानेक पीड़ायें सहन करते हुये आप व्यर्थका कष्ट झेल रहे हैं और यह कष्ट-सहिष्णुता ही आपको मुक्ति दिला देगी, परन्तु यह उनका केवल भ्रम है । आज मुझे आपके प्रसाद से तत्त्वों का प्रकाश मिला है । कोई जीव अशान्ति के मार्ग में से शान्ति पा नहीं सकता, ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है। आपके जीवन को तपश्चरण का जीवन कहा जाता है, परन्तु न जाने क्यों मुझे वह फूलों की सेज पर विश्राम करता प्रतीत होता है? यह सुख का मार्ग है, इसमें दुःख है ही नहीं। कड़ाके की सर्दी सहन करते हुये भी आपकी मुखाकृति देखने पर आपके अन्तर में कल्लोलित शान्त रस का सागर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। अशान्ति की एक रेखा को भी वहाँ प्रवेश नहीं। सर्दी आदि सहन करने से आपको दुःख होता तो आपके अन्दर अशान्ति होती, और वह आपके मस्तक पर आये बिना न रहती, परन्तु यहाँ वह दीखती नहीं। अब मैं जान पाया कि ये बाधायें आपके लिये बाधायें नहीं हैं, आपका वीरत्व जागृत हो चुका है, आज आपने साक्षात् शत्रुओं को ललकारा है, शत्रु सामने खड़े हैं परन्तु किसी में सामर्थ्य नहीं कि आपको डिगा सके । धन्य है आपका यह साहस कि यह बात प्रत्यक्ष दिखादी, शब्दों से नहीं वरन अपने जीवन से। कितने बड़े योद्धा बनकर युद्ध क्षेत्र में उतरे हैं आप, जहाँ बड़े से बड़ा शत्रु आता है आपको विचलित करने के लिये, आपकी परीक्षा लेने के लिये पौष-माघ में चलने वाला तीव्र वायु का वेग रात्रि को कितनी ठण्डी कर देता है, परन्तु आप ऐसी रात्रि में धैर्य और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002675
Book TitleShantipath Pradarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherJinendravarni Granthamala Panipat
Publication Year2001
Total Pages346
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Biography
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy