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________________ ५९ का० ९. ७५] बौद्धमतम् । ६७४. प्रत्यक्षपरोक्षातिरिक्तं प्रमेयान्तरं नास्तीति चाध्यक्षेणैव प्रतिपाद्यते। अध्यक्ष हि पुरःस्थितार्थसामर्थ्यादुपजायमानं तद्गतात्मनियतप्रतिभासावभासादेव तस्यार्थस्य प्रत्यक्षव्यवहारकारणं भवति, तदन्यार्थात्मतां च तस्य व्यवच्छिन्दानमन्यत्परोक्षमर्थजातं सकलं राश्यन्तरत्वेन व्यवस्थापयत्तुतीयप्रकाराभावं च साधयति, अध्यक्षेणाप्रतीयमानस्य सकलस्यार्थजातस्यान्यत्वेन परोक्षतया व्यवस्थापनात् । अन्यथा तस्य तदन्यार्थरूपताऽव्यवच्छेदे स्वीयरूपतयापि परिच्छेदो न भवेदिति न किंचित्प्रत्यक्षेणावगतं भवेत् । प्रतिनियतस्वरूपता हि भावानां प्रमाणतो व्यवस्थिता । अन्यथा सर्वस्य सर्वथोपलम्भादिप्रसङ्गतः प्रतिनियतव्यवहारोच्छेदप्रसक्तिर्भवेत् । प्रतिनियतस्वरूपता चेन्न प्रत्यक्षावगता किमन्यद्रूपं तेन तस्यावगतमिति पदार्थस्वरूपावभासिनाध्यक्षेण प्रमेयान्तराभावः प्रतिपादित एव । ६७५. अनुमानतोऽपि तदभावःप्रतीयत एव, अन्योन्यव्यवच्छेदरूपाणामितरप्रकारव्यवच्छेदेन तदितरप्रकारव्यवस्थापनात् । प्रयोगश्चात्र-यत्र यत्प्रकारव्यवच्छेदेन तदितरप्रकारव्यवस्था, न तत्र ६७४. 'प्रत्यक्ष और परोक्षसे भिन्न कोई तीसरा प्रमेय नहीं है' इसका साक्षी तो स्वयं प्रत्यक्ष ही है। प्रत्यक्ष सामने विद्यमान पदार्थको सामर्थ्यसे उत्पन्न होता है और उस अर्थके आकारवाला होने के कारण उसका प्रतिभास उसी पदार्थके स्वरूपमें ही केन्द्रित होकर उस अर्थमें प्रत्यक्ष व्यवहार करा देता है । जैसे कि घट पदार्थसे उत्पन्न होनेवाला प्रत्यक्ष घटके आकारवाला होनेके कारण 'घटोऽयम्' इस रूपसे घट पदार्थके स्वरूपमें ही सीमाबद्ध होकर घट अर्थमें ही प्रत्यक्ष व्यवहार कराता है। घट प्रत्यक्ष केवल घट व्यवहार करके ही चुप नहीं बैठता किन्तु अपने विषयका अन्य समस्त घट भिन्न पदार्थोसे व्यवच्छेद भी करता है। इस तरह प्रत्यक्ष अपने नियत विषयमें प्रत्यक्ष व्यवहार करानेके साथ ही साथ लगे हाथ अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति भी करता जाता है। ये अन्य पदार्थ ही जिनसे कि प्रत्यक्ष अपने प्रत्यक्षभूत अर्थको व्यावृत्ति करता है परोक्ष राशिमें शामिल होते हैं। बस, पदार्थों की इन प्रत्यक्ष और परोक्ष दो राशियोंसे भिन्न कोई तीसरी राशि हो ही नहीं सकती; क्योंकि प्रत्यक्षके विषय नहीं होनेवाले यावत् प्रत्यक्षभिन्न पदार्थ परोक्षराशिमें अन्तर्भूत हैं। यदि प्रत्यक्ष अपने विषयभूत पदार्थका अन्य पर-पदार्थों से व्यवच्छेद न करे तो वह अपने विषयका प्रतिनियत रूपमें परिच्छेद ही न कर सकेगा। मतलब यह कि किसी भी पदार्थका प्रत्यक्ष हो नहीं हो सकेगा। प्रमाणके द्वारा तो पदार्थोंका प्रतिनियत स्वरूप ही व्यवस्थित होता है। प्रतिनियत स्वरूपकी व्यवस्था अन्य पररूपका व्यवच्छेद करनेके बाद स्वरूपका ग्रहण करके हो हो है । यदि प्रमाण प्रतिनियत स्वरूपकी व्यवस्था न करे तो सभी पदार्थ सब आकारोंमें उपलब्ध होने लगेंगे। ऐसी दशामें जगत्से 'यह जल है' 'यह अग्नि है', इत्यादि प्रतिनियत व्यवहारका हो लोप हो जायेगा। यदि प्रत्यक्ष पदार्थके प्रतिनियत स्वरूपको नहीं जानता है तब आखिर वह पदार्थके किस रूपको जानेगा? इस तरह पदार्थक प्रतिनियत स्वरूपको जाननेवाला प्रत्यक्ष ही प्रत्यक्ष और परोक्षसे अतिरिक्त अन्य प्रमेयके अभावको कह रह ७५. अनुमानसे भी प्रत्यक्ष और परोक्षसे अतिरिक्त तृतीय प्रमेयान्तरका अभाव प्रतीत होता है । जो दो वस्तुएं एक-दूसरेका अभाव करके व्यवस्थित होती हैं उनमें-से किसी एकका निषेध करनेसे दूसरेकी विधि अपने हो आप हो जाती है। जैसे नीलता अनीलताका व्यवच्छेद करके तथा अनीलता नीलताका निषेध करके अपना स्वरूप लाभ करती है, अतः जहां नीलताका १. -व्यवस्थानात् म. २। २. तुलना-“यत्र यत्प्रकारव्यवच्छेदेन यदितरप्रकारव्यवस्थानं न तत्र प्रकारान्तरसंभवः तद्यथा नीलप्रकार व्यवच्छेदेन अनीलप्रकारान्तरव्यवस्थायां पीते." -हेतुषि. टी. पृ. १४८ । तरवसं.पू. १३३-४८५। ३. तदितरव्यवस्थानं तत्र म.२। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002674
Book TitleShaddarshan Samucchaya
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1981
Total Pages536
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size15 MB
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