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________________ - का० ५५. ९३२५ ] जैनमतम् । तिर्यग्लोकवर्त्यपि स जम्बूद्वी पर्वातत्वेनास्ति न पुनरपरद्वीपादिवर्तितया । सोऽपि भरतवतित्वेनास्ति न पुनविदेहवतत्वादिना । भरतेऽपि स पाटलिपुत्रवर्तित्वेनास्ति न पुनरन्यस्थानीयत्वेन । पाटलिपुत्रेऽपि देवदत्तगृहवतत्वेनास्ति न पुनरपरथा । गृहेऽपि गृहैकदेशस्थतयास्ति न पुनरन्यदेशादितया । गृहैकदेशेऽपि स येष्वाकाशप्रदेशेष्वस्ति तत्स्थिततयास्ति न पुनरन्यप्रदेशस्थतया । एवं यथासंभवमपरप्रकारेणापि वाच्यम् । तदेवं क्षेत्रतः स्वपर्यायाः स्तोकाः परपर्यायास्त्वसंख्येयाः, लोकस्यासंख्येयप्रदेशत्वेन । अथवा मनुष्यलोकस्थितस्य घटस्य तदपरस्थान स्थितद्रव्ये - भ्योऽनन्तेभ्यो व्यावृत्तत्वेनानन्ताः परपर्यायाः । एवं देवदत्तगृहादिवतनोऽपि । ततः परपर्याया अनन्ताः । ३२५. कालतस्तु नित्यतया स स्वद्रव्येणावर्तत वर्तते वर्तिष्यते च ततो न कुतोऽपि व्यावर्त्तते । स चैदंयुगीनत्वेन विवक्ष्यमाणस्तद्रूपत्वेनास्ति न त्वतीतानागतादियुगवतत्वेन । अस्मिन् युगेऽपि स ऐषमस्त्यवर्षतयास्ति न पुनरतीतादिवर्षत्वादिना । ऐषमस्त्योऽपि स वासन्तिक काशको परपर्याय कह सकते हैं; परन्तु चाहनेपर भी अलोकमें घड़ा कभी भी नहीं रह सकता सर्वदा लोक में ही रहता है अतः उस रूपसे परपर्यायकी विवक्षा नहीं की है। यदि विवक्षा की जाये तो फिर 'घड़ा आकाशमें रहता है' इस रूपमें जब आकाश स्वपर्याय होगी तब परपर्याय कुछ भी नहीं होगी । त्रिलोकवर्ती भी घड़ा मध्यलोकमें रहता है स्वर्ग या नरकमें नहीं अतः मध्यलोककी दृष्टिसे सत् है तथा ऊर्ध्व और अधोलोककी दृष्टिसे असत् । मध्यलोकवर्ती होकर भी घड़ा जम्बूद्वीप में रहता है अतः जम्बूद्वीपकी दृष्टिसे सत् तथा अन्य द्वीपों की दृष्टिसे असत् है । जम्बूद्वीप में भी वह भरत क्षेत्रमें रहता है विदेह आदि क्षेत्रों में नहीं अतः भरतक्षेत्रकी दृष्टिसे सत् है तथा विदेह आदिकी दृष्टिसे असत् । भरतक्षेत्र में भी वह पटना में रहता है अतः पटने की दृष्टिसे सत् है तथा अन्य शहरोंकी दृष्टिसे असत् । पटने में भी वह देवदत्तके घर में रखा है, अतः देवदत्तके घरकी दृष्टिसे सत् तथा अन्य घरोंकी दृष्टिसे असत् । देवदत्तके घर में भी वह घरके एक कोने में रखा है, अत: उस कोनेकी दृष्टिसे वह सत् है तथा मकानके अन्य भागोंकी दृष्टिसे असत् । कोने में भी वह जिन आकाश प्रदेशोंमें रखा है उन आकाश प्रदेशोंकी दृष्टिसे सत् है तथा अन्य आकाशों की दृष्टिसे असत् । इस तरह यथासम्भव और भी प्रकारोंसे सदसत्त्वका विचार करना चाहिए। जिनकी अपेक्षा अस्तित्वका विचार किया जाता है वे स्वपर्यायें थोड़ी हैं तथा जिनकी अपेक्षा नास्तित्वका विचार होता है वे परपर्यायें तो असंख्य हैं; क्योंकि लोकके असंख्य प्रदेश होते हैं । घड़ा जिस समय कुछ अमुक प्रदेशों में रहेगा तब स्वपर्याय तो एक होगी तथा परपर्यायें तो लोकके बाकी असंख्य प्रदेश ही होंगे । अथवा मनुष्यलोकवर्ती घड़ा अन्य अनन्त क्षेत्रोंसे व्यावृत्त होगा अतः समस्त आकाशके अनन्त ही प्रदेश परपर्याय हो सकते हैं। इस तरह क्षेत्रकी अपेक्षा भी परपर्यायें अनन्त हो सकती हैं । देवदत्तके घरमें रहनेवाला भी घड़ा घरके बाहरके अनन्त आकाशप्रदेशों में नहीं रहता अतः परपर्यायें अनन्त हो सकती हैं । ३३१ $ ३२५. कालकी दृष्टिसे जब घड़ेको द्रव्यकी अपेक्षा नित्य मानते हैं तब वह वर्तमानमें रहता है अतीत में था तथा आगे भी होगा इस तरह त्रिकालवर्ती होने के कारण त्रिकाल तो स्वपर्याय है तथा कोई ऐसा काल है ही नहीं जिसमें घड़ा न रहता हो अतः त्रिकालको स्वपर्याय माननेपर कोई भी पर नहीं है । त्रिकालवर्ती भी घड़ा इस युग में रहता है अतः वह इस युगकी दृष्टिसे सत् है तथा अतीत या अनागत युगकी दृष्टिसे असत् । इस युग में भी वह इस वर्ष में सत् है तथा १. तया जम्बूद्वीपवर्त्यपि भरत - म. २ । २-३ परपर्यया-म २ । ४ -ष्यति ततो १, २ । ५. - मस्त्यतया-भ. १, २, प. १, २ । Jain Education International For Private & Personal Use Only म. १, २, प. www.jainelibrary.org
SR No.002674
Book TitleShaddarshan Samucchaya
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1981
Total Pages536
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size15 MB
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