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________________ विविहाहि-वाहि-विनडियह मरणु धण-सयण-रूव-जोवण-सणाहु धम्मह विणु होइ न कोइ सरणु इय मुणउं नराहिव में अणाहु - २० घत्ता एवं मई जाणिउ, मणु समि आणिउ, संग-विमुक्कु विवेअ-जुउ । पडिवज्जिउ संजमु, नो-इंदिय-दमु तउ अप्प-परह वि नाहु रहउ ॥२१ [२] अणाहया अवर वि जाण राय जह भणेइ जिणाहिव वीयराय पव्वज्ज पवज्जिय जेण वज्ज। तव-चरण-करण न हवंति सज्ज मोहंधयार-निउरंब-छूढ जड-जोगि भवाडवि-मग्ग-मृढ दुह-बंध-बद्ध तिहुअणु भमंति न हु रोग-दोसवसि वीसमंति तिहिं दंडिहिं दंडिय अप्पु जाहं । तिहिं सरिलहिं सल्लिय सुहु न ताहं ति-विराहणाहिं बोहिं हणंति तिग्गारव-गुरु भवु उवचिणंति ६ किं कुणइ नाणु तवु झाणु दाणु जे लिति अणेसणु भत्तपाणु अह कोय-कडाइय वसहिं वत्थ तह होइ तह च्चिय भव अवत्थ ८ जे आगम-सत्थ-निउत्त सत्थ तस्सऽन्नह करणि अणत्थ सत्थ जे सुत्त-बज्झ-देसण कुणंति अप्पं पि अप्पु न हु ते मुणंति १० वहु-पाव-पवंचिहिं वंचियाण किं कुणइ ताण जिणनाह-आण अइ वल्लह वरि मुंचंति पाण न कहिंचि पवज्जइं जिणह आण १२ जे विसय-कसाय-पमाय-पत्त न हु मोह-महन्नव-पार-पत्त अप्पाभिप्पायहिं संचरंति अप्पणमवि परमवि कुगई निति १४ अणाहया ताहं वि दिक्खियाण सया वि सुगुरूहिं असिक्खियाण जे माइठाणऽणुट्ठाण ठंति वीरिय-आयारि न उज्जमंति । मोह-निव-नडिय अणाह हुंति मगहाहिव ते सवि कुगई जंति एवं अणाह जिय सव्व-लोइ सिरि-जिणवरिंद-आणा-विओइ । जं जिणवरिंद-आणा पहाण सम्गापवग्ग-गइ सुह-निहाण इय मुणिय नराहिव भव-अवाय सिरि-वीयराय अणुसरसु पाय २० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002656
Book TitleSamdhikavya Samucchaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorR M Shah
PublisherL D Indology Ahmedabad
Publication Year1980
Total Pages162
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size7 MB
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