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________________ शीलोपदेशमाला-बालावबोध ग्रहण करावी, आपणी दृष्टि-हूं ती अलगो करी' कहिलं, 'जा, आपणउं कर्म भोगवि' । तिसिई प्रधाने प्रणाम करी राजा वीनविउ, 'स्वामी ! एवडउ कोप पुत्री-ऊपरि न कीजइ ।' तुहा राजानउ कोप उपशमइ नहीं । तेतलई गुणसुंदरी आपणपउं धन्य मानती ते काष्टहार-संघातिइं जिहां जीर्ण घर पडिउं छइ तिहां आवी, भर्तारनइ आसन मूकी, हाथ जोडी, आगलि ऊभी रही । पछइ काष्टवाहक इसिउं कहइ, 'हे भद्रि! तू आपणी इच्छाई जिहां विचारि आवइ तिहां "जा । सोन जिहां जाइ तिहां गौरवपण लहइ।' ए वात सांभली गुणसुंदरी कहई, 'स्वामिन् ! इणिइ भवि चिंतामणि समान मई तूं भरतार पडिवजिउ । आज पछ। ए वात न कहिवी ।' पछइ काष्टवाहकनइ माथइ वेणी करिवा-भणी मस्तकना अलक विरला वरिवा लागी । तेतलइ बावन्ना चंदननउ परिमल आविउ । आपणी उत्पातिकी बुद्धिई भर्तार पूछिउं. 'स्वामिन् ! आज काष्टनउ भारउ किहां वेचिउ ?' तेणिइ कहिउं, 'मई भोजन-माटि कंदोईनइ हाटि मूंकिउ छइ ।' पछइ गुणसुंदरीइ भर्तार-सहित तेणई हाटि जई, कांई एक भोजननउं मूल देई, काष्टनउ भारउ घर-माहि आणिउ । ते बावन्ना चंदननां काष्ट खंडोखंडि करी, सुरहिया गांधीनई हाटि खंड एक वेचिवा मोकलिउ । तेणिइ सोना-समतोली चंदन लीधउं । पछह तेणिई सोनइ वस्त्र आभरण सर्व नवां कीधां। वृत तंदुलादिके घर संपूर्ण भराणां । पछइ राजसुताई भरतारनइ स्नान कराविउ । हवई ते रांकनइ राजसुताना लाभ-इतु पुण्यपाल इसिउं नाम लोके दीध। तिवार-पछई राजसुताई ते पुण्यपाल-पासि ते चंदनवृक्ष अणावी ख डउ खंडि करी “ओरडउ भरी मूंकिउ । मउडई मउडई ते सर्व चंदन वेचावी, व्यवहार" सीखवी, धनराशि एकठी करी, नगर-माहि व्यवसाय मंडाविउ । पणि लेख न जाणइ, अक्षरमात्र समझइ नहीं । पछइ नगर टूकडउं गाम एक छइ तिहां गुणसुंदरी पुण्यपालनइ लेई माई-प्रमुख सर्व सूत्र'२, अंक, सर्व व्यवहार, सर्व परीक्षा थोडाइं दिवस-माहि सीखवी । तिवार-पछई संघातनी रचना करी तिहां हूंतां पोतनपुरि गयां । तेणई नगरि पुण्यपालपाहिई तिम व्यवसाय मंडाविउ जिम थोडा दिवस-माहि अति धनवंत हउ । तिसिइ गुणदरीई पूर्विला पुण्य लगइ जूना घर-माहि वहीयावट एक लिखिउ लाघउ । ते वाचिवा लागो । तिहां साते ऊखवे ईटवाह सोनानउ हुइ एहवा प्रयोग देखो हर्षित हंती, संयोग मेली, सुवर्णनी राशि करी, राजा-समीपि भूमिका मागी, उत्तंग-तोरण प्रासाद कराविउ । पछई कांई एक मन-माहि विचारी, पुण्यपाल-पाहई घणा प्रवहण वस्तु भरावी, सिंहलद्वीपभणी पुण्यपाल नई गुणसुदरो चाल्यां । वाटई महांत यश उपार्जतां अनेक धर्मकार्य करतां. सिंहलद्वीपि आव्यां । तिहां धननइ बलिई अनेक तुरंगम, भद्रजाती हस्ती, अनेक मणि माणिक्य रत्न मुक्ताफलना संग्रह करावी. पुण्यपालनइ इसिउं कहि', 'स्वामिन् ! ते धननउंसि प्रमाण जे स्वजन-संबंधीनइ चमत्कार न ऊपजावइ ? एह-भणी भद्दिलपुरि पिता अरिकेसरी राजाई जे हूं सभा माहि अवगणी तूं हनइं कर्मनां फल जोवा-भणी आपी, तेह-भणी तिहां जई कर्मनउं फल देखाडउ ।' इम कहिइ हूंतइ पुण्य-पालिई प्रयाणभंभा देवरावी पाछउ चालिउ ।। १. P. कीधी; L. तेडी. २. P. जाहि. ३. L. आपणं. ४ P. जाहि. ५. B. भरिनइ आगलि. ६. A. राजसुताई पुण्यपाल. ७. K. पाहिइं. ८. P. 'उरडउ...ते' नथी. ९. L. नथी. १०. P.L. वेची. ११. P.L. नथी. १२. L. नथी. १३. P. अवगणी हूंती. १४. L. नथी. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002655
Book TitleSilopadesamala Balavbodh
Original Sutra AuthorMerusundar Gani
AuthorH C Bhayani, R M Shah, Gitaben
PublisherL D Indology Ahmedabad
Publication Year1980
Total Pages234
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size14 MB
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