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________________ २७ से निकल जाता है, किन्तु अमायी सम्यग्दृष्टि उपपन्नक देव भावितात्मा अनगार को देखकर वन्दन, नमस्कार, सत्कार, सम्मान आदि करके पर्युपासना करता है । वह उनके बीच से नहीं निकलता । देव अपनी शक्ति से चार-पाँच देववासों के अन्तरों का उल्लंघन कर सकते हैं । किन्तु इसके पश्चात् वे परशक्ति द्वारा ऐसा कर सकते हैं । तिर्यंच गति के ४८, मनुष्य गति के ३०३, देवगति के १९८, नरक गति के १४ कुल मिलाकर ४८ + ३०३+१९८ + १४ = ५६३ होते हैं । ३४ जीव - भेद हमारी आत्मा उपरोक्त प्रकार के ५६३ भेदों में ५ अनुत्तर के बिना अनंतानंत बार परिभ्रमण कर आई है । अत: अब, जब कि हमें मानव भव मिला है, मुक्ति की साधना में अवश्य उद्यमशील रहना चाहिए । तभी दुःखों से मुक्ति एवं सुख कि प्राप्ति होगी । उपरोक्त गतियों के २ भेद किये जा सकते है - १) प्रत्यक्ष और २) परोक्ष जो अपनी आँखो से देखे जा सकते हैं उसको प्रत्यक्ष कहते हैं । वह तिर्यंच गति और मनुष्य गति । जो अपन जैन आगमो से, शास्त्रो में लिखा हुआ या सुनकर सोचकर अनुभव कर सकते है, उसे परोक्ष गति कहते हैं : वे है नरकगति और देवगति । उपरोक्त कौनसी गति कौन से कर्म के बंध के कारण उदय में आती है उसका उल्लेख करेगें । कर्मानुसार गति बंध : कौन सी गति किस प्रकार के कर्म से प्राप्त होती है ? इसके लिये जैन मान्यता है कि सामान्य रूप से तीन योग और चार कषाय ही सब कर्म प्रकृतियों के बन्धहेतु है, फिर भी कषायजन्य अनेकविध प्रवृत्तियों में से कौन-कौन सी प्रवृत्ति किस-किस कर्म के बन्ध के कारण कौन सी गति प्राप्त होती है, यह इसमें विभागपूर्वक देखेंगे । शुभ - योग का कार्य पुण्यप्रकृति का बन्ध और अशुभ योग का कार्य पापप्रकृति का बन्ध है । इसी के अनुसार गति का बंध होता है । गति के चार प्रकार है १) नरक; २) तिर्यंच; ३) मनुष्य और ४) देव । Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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