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________________ २८ १) नरक गति के बंध के कारण-३५ १) आरंभ-प्राणियों को दुःख पहुँचे ऐसी कषायपूर्वक प्रवृत्ति है । २) परिग्रह—यह वस्तु मेरी है और मैं इसका स्वामी हूँ ऐसा संकल्प । ३) हिंसादि-क्रूर कामों में सतत प्रवृत्ति होना । ४) दूसरे के धन का अपहरण करना । ५) भोगों में अत्यन्त आसक्ति रखना । ६) मांसाहार और पंचेन्द्रिय वध करना । ७) कृष्ण लेश्या के परिणाम अथवा रौद्रध्यान होना । ८) झूठे संकल्प-विकल्पों की सतत मनोप्रवृत्ति होना । ९) तीव्रतम क्रोध-मान-माया-लोभ के परिणाम होना । १०) परस्त्री-गमन विषयक सतत आसक्ति रखना ।। ११) अभक्ष्य-भक्षण की सतत प्रवृत्ति होना । ऐसे लक्षण युक्त परिणाम वाले जीव नरकायु का आस्रव करते है अर्थात् भवांतर में नरक गति योग्य कर्मों का बंधन करते हैं ।३६ २) तिर्यंच :- तिर्यञ्च गति के बंध के कारण १) माया अर्थात् छलप्रपंच करना । २) कुटिल भाव रखना । शल्य युक्त, ठगनेवाला, धूर्तमानव ।३८ ३) धर्मतत्त्व के उपदेश में धर्म के नाम से मिथ्या तत्त्वो को मिलाकर उनका स्वार्थ-बुद्धि से प्रचार करना । ४) जीवन को शील से दूर रखना ।। ५) असता वचन तता कुधर्म-देश्ना देना । ६) अनीति, कूड-कपट, माया आदि करने से । ७) नील अथवा कपोत लेश्या के परिणामों से । ८) बहुलता से आर्तध्यान करने से । ९) मध्यम आंरभ परिग्रहादि करने से । १०) झूठे माप-तोल करने से । ___Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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