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________________ १२६ १. कल्पोपपन्न जहाँ कल्प-आचार-मर्यादा हो अर्थात् जहाँ इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश आदि की मर्यादा और व्यवहार हो, वे कल्पोपपन्न हैं । कल्प अर्थात् १२ स्वर्गों में उत्पन्न होनेवाले देव कल्पोपपन्न होते हैं । २. कल्पातीत जहाँ उपरोक्त व्यवहार अर्थात् मर्यादा न हो वे कल्पातीत हैं । नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तर विमानो में उत्पन्न होनेवालें देव कल्पातीत कहलाते ये समस्त वैमानिक न तो एक ही स्थान में हैं और न तिरछे हैं, किन्तु एक-दूसरे के ऊपर-ऊपर स्थित हैं ।१२६ ४. वैमानिक देवों के प्रभेद :१२७ - कल्पोपपन्न के १२ प्रकार हैं१) सौधर्म ७) महाशुक्र २) ईशान ८) सहस्त्रार ३) सनत्कुमार ९) आनत ४) माहेन्द्र १०) प्राणत ५) ब्रह्मलोक ११) आरण ६) लान्तक १२) अच्युत । कल्पातीत के दो प्रकार है - १) ग्रैवेयक २) अनुत्तरौपपातिक ग्रैवेयक के ९ भेद हैं१) अधस्तनाधस्तन ६) मध्यमोपरितन २) अधस्तन मध्यम ७) उपरिम-अधस्तन ३) अधस्तन उपरितन ८) उपरिम-मध्यम ४) मध्यम अधस्तन ९) उपरिम-मध्यम ५) मध्यम-मध्यम Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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