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________________ परिशिष्टम्-१ बालवबोध-भावानुवादौ २९७ वियक्कं क० राज्यादिक लेवानी चिंता, अत्र नंदराज्य लेवानी विमासणइ चाणक्कानुं दृष्टान्त ।।३९।। हिंसं क० हिंसा जीवनूं मारवू तेहनूं ध्यान, अत्र कालसौकरिकनूं दृष्टान्त ।।४०।। हास्य क० अनेरानइ हसवू तेहनूं ध्यान, अत्र मित्र सहित चंडरुद्राचार्यना शिष्य, दृष्टान्त ।।४१।। पहासं क० अनेरानई उपहास, करवू, स्तुतिरूपं निंदायूँ करवू तेहनुं ध्यान, अत्र जोसीवर्तीया वांदउं इम कहता चंडप्रद्योतनुं दृष्टान्त ।।४२।। पओसं क० प्रद्वेष अतिहिं रीसनूं करिवू तेहनूं ध्यान, अत्र मरूभूतिकमठनु दृष्टान्त ।।४३ ।। फरुसं० परूष क० अतिहिं करर्कश मर्मनुं करवू तेहनूं ध्यान, ब्रह्मदत्त प्रति चुलनीनी परइ, साप फीटी फूल थई तेहनूं भर्तार दृष्टान्त ।।४४ ।। भयनूं ध्यान गजसुकुमालनइं उपसर्ग कर्या पूंठई, सोमिलनी परइ ।।४५।। रूवं झाणे रूप बिहूं प्रकारे स्वरूपनूं ध्यान अनइ पररूपनुं ध्यान, स्वरूपध्यान ते जे माहारूरूप भलू इत्यादि । पररूप ध्यान ते जे चित्रफलाकादि लिखित अनेरानां रूपनुं वखाण करवू, ए उपरि देवताई प्रसंस्या पूठिइ सनतकुमार। दृष्टान्त । पररूपध्यान उपरि अंगारवती रूप देखी चंदप्रद्योत तणउं दृष्टान्त ।।४६।। अप्पसंस क० आत्मानी प्रसंसानूं ध्यान कखउं होइ, आपणा काव्य प्रशंसावती वररूचि दृष्टान्त ।।४७ ।। पर अनेरानी निंदा हेलानूं ध्यान, करगडू उपरि चिहु तपीयानुं दृष्टान्त ।।४८।। पर अनेरानइं मुखामुखी गर्दा हेलावू करवू, अत्र दुर्बलिकापुष्पमित्रना दोष बोलता गोष्ठामाहिलनुं दृष्टान्त ।।४९।। परिग्रह क० घनघान्यादिरूप तेहनूं ध्यान, अत्र मुनिपति कुंचिक दृष्टान्त ।।५० ।। परपरिवादं क० पर अनेराप्रतइं अछता दोषनूं कहिवं, अत्र सुभद्रानी सासुनुं दृष्टान्त ।।५१।। परदूषणक क० निरापराधीनइ माथइ आपणा कीधी अपराधनूं चडाविवू तेहनूं ध्यान, अत्र अंगऋषि-रुद्रनो दृष्टान्त ।।५२।। आरंभ कहतां अनेरानइ पराभव करवू तेहनूं ध्यान, कुरुडोत्कुरुडनुं दृष्टान्त ।।५३।। संरंभ क० विषयादिकनइं विषइ तीव्राभिलाष तेहनूं ध्यान, अत्र क्षुल्लककुमार दृष्टान्त ।।५४ ।। पावाणंमोयणं झाणं क० पाप कहीइ परस्त्रीसेवादिक तेहनूं ध्यान, अनुमोदवू, एणइ ए काम वारु कर्यु, इत्यादि कहिवं तेहनूं ध्यान, राजभार्या सेवक राय निग्रहीतपुरुषी अनुमोदक जन दृष्टान्त ।।५५।। अधिकरण क० पाप उपजाइवानूं हेतु । शस्त्रादिक तेहनूं ध्यान, अत्र नंदमाणीकारनुं दृष्टान्त ।।५६।। असमाधिमरण क० असमाधिइं पीडीइं, ए मरइ तो वारु एहवं चीतवियूँ तेहनूं ध्यान, अत्र स्कंदकाचार्य, पीलणहार पालकनुं दृष्टान्त ।।५७।। कम्मोदयपच्चयं क० कर्मनो जे उदय तेणे प्रत्यई हेतइं करी जे ध्यान आवइ ते कम्मोदयप्रतय ध्यान कहीइ । ए परमार्थ-कोइ प्रथम शुभपरिणामवंत हुइ अनइ पछे कोइक कर्मनइं उदयइं करी अशुभध्यान आवइ अत्र कृष्णनइ मरणांते कुध्यान हुओ ते दृष्टान्त ।।५८।। ऋद्धि क० राज्य ऐश्वर्यादिरूप तेणइ करी गारव, आतमानइं अहंकार को तेहनूं ध्यान कर्यु होइ, अत्र वीरस्वामीनइ वांदिवा जाता दर्शाणभद्रनो दृष्टान्त ।।५९।। Jain Education International 2010_02 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002562
Book TitleAgam 25 Prakirnak 02 Atur Pratyakhyan Sutra
Original Sutra AuthorVeerbhadra Gani
AuthorKirtiyashsuri
PublisherSanmarg Prakashan
Publication Year2010
Total Pages400
LanguagePrakrit, Sanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, F000, & F020
File Size11 MB
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