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________________ २६५ अ० ५. लोकसार, उ०३-४. सूत्र ५८-६२ ६०. पंतं लूहं सेवंति, वीरा समत्तवंसिणो। सं०-प्रान्तं रूक्षं सेवन्ते वीराः समत्वदर्शिनः । समत्वदर्शी वीर प्रान्त-नीरस और रूक्ष आहार का सेवन करते हैं । ६१. एस ओहंतरे मुणी, तिण्णे मुत्ते विरए वियाहिए।-त्ति बेमि।। सं०-एष ओघन्तरः मुनिः तीर्णः मुक्तः विरतः व्याहृतः । ---इति ब्रवीमि । जन्म-मृत्यु के प्रवाह को तैरने वाला यह मुनि तीर्ण, मुक्त और विरत कहलाता है। ऐसा मैं कहता हूं। भाष्यम् ५९-६१-द्रष्टव्यं २/१६३,१६४,१६५ क्रमशः इन तीन सूत्रों ५९,६०,६१ की व्याख्या के लिए देखें-क्रमशः सूत्राणां भाष्यम् । २।१६३, १६४ और १६५ सूत्रों का भाष्य । चउत्थो उद्देसो : चौथा उद्देशक ६२. गामाणुगाम दूइज्जमाणस्स दुज्जातं दुप्परक्कंतं भवति अवियत्तस्स भिक्खणो। सं.-ग्रामानुग्रामं दूयमानस्य दुर्यातं दुष्पराक्रान्तं भवति अव्यक्तस्य भिक्षोः । जो भिक्षु अव्यक्त अवस्था में अकेला प्रामानुग्राम विहार करता है, वह उपद्रवों से अभिभूत होता है और अवांछनीय पराक्रम करता है। भाष्यम् ६२-इदानीं अव्यक्तस्य एकलविहारे प्रस्तुत आलापक में सूत्रकार अव्यक्त-अगीतार्थ साधक के जायमानान् अपायान् दर्शयति सूत्रकारः । अव्यक्तः एकलविहार में होने वाले दोषों का दिग्दर्शन कराते हैं। साधक श्रुतश्रुतेन वयसा च भवति । येन आचारप्रकल्पः अधीत:- ज्ञान तथा अवस्था से अव्यक्त होता है। जिसने आचारप्रकल्प अर्थतोऽधिगतः अथवा येन पठितेन एकलविहारप्रतिमा- (निशीथ सूत्र) को पढ लिया है, उसके अर्थ को अधिगत कर लिया है योग्यो भवति स श्रुतेन व्यक्तः। येन आचारप्रकल्पो अथवा जिसके पढने से एकल-विहार-प्रतिमा की योग्यता सम्पादित कर नाधीतः स श्रुतेन अव्यक्तः । षोडशवर्षादधो विद्यमानः ली है, वह ज्ञान से व्यक्त है। जिसने आचार-प्रकल्प नहीं पढा, वह वयसा अव्यक्तः । तस्य भिक्षोः ग्रामानुग्राम दूयमानस्य ज्ञान से अव्यक्त है। जो सोलह वर्ष से कम है, वह अवस्था से अव्यक्त दुर्यातं दुष्पराक्रांतं भवति । है। उस भिक्षु का प्रामानुग्राम विहरण करना दुर्यात और दुष्पराक्रान्त होता हैं। अनुग्राम:--विह्रियमाणग्रामादन्यः ग्रामः । दुर्यातं अनुग्राम का अर्थ है विहरण किए जाने वाले ग्राम से दूसरा दुष्पराक्रान्तम्-अव्यक्तस्य भिक्षोः एकलविहाराय गमनं ग्राम । दुर्यात और दुष्पराक्रांत का अर्थ है-अव्यक्त भिक्षु का अकेले उपद्रवैरभिभूतं भवति तथा तस्य पराक्रमोऽपि साधना- विहरण करना उपद्रवों से अभिभूत होना है और उसका पराक्रम भी पथात् प्रतिकूले मार्गप्रवर्तते ।। साधना मार्ग से प्रतिकूल मार्ग में ही लगता है। १. 'दूङच'-परितापे इति दिवादिगणस्थस्य धातोः 'वूयमान' कुछ व्यक्ति ज्ञान और अवस्था दोनों से अव्यक्त होते हैं। इति शानप्रत्ययरूपं निष्पद्यते, न तु 'इंगतो' इति धातोः। कुछ व्यक्ति ज्ञान से अव्यक्त और अवस्था से व्यक्त होते हैं। अस्मिन् विषये वृत्तिकारस्य मतमिदम् -'दूयमानस्य' कुछ व्यक्ति ज्ञान से व्यक्त और अवस्था से अव्यक्त होते हैं । अनेकार्यस्वाद् धातूनां विहरतः।' (वृ० १० १९३) कुछ व्यक्ति ज्ञान और अवस्था-दोनों से व्यक्त होते हैं। चूणिकारेण इदं मतं अन्यथा व्याख्यातम्-'हेमंतगिम्हासु सोलह वर्ष की अवस्था से ऊपर का व्यक्ति अवस्था से दोसु रिज्जति, जति दोहिं वा पादेहि रिज्जति दूइज्जति व्यक्त होता है और नौवें पूर्व की तीसरी आचार-वस्तु तक दूइज्जं ।' (चूणि, पृष्ठ १८१) को जानने वाला ज्ञान से व्यक्त होता है। २. शिष्य ने पूछा-'भंते ! अव्यक्त कौन होता है ?' जो मुनि ज्ञान और अवस्था-बोनों से व्यक्त होता है आचार्य ने कहा वह प्रयोजनवश अकेला विहार कर सकता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002552
Book TitleAcharangabhasyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1994
Total Pages590
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Research, & agam_acharang
File Size14 MB
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