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________________ चौबीस ही तीर्थंकर सभी पूर्वोपार्जित प्रबल पुण्योदय से राजकुल में उत्पन्न हुए है। ग़ज ऋद्धि-सिद्धि सम्पत्ति-समृद्धि उनके परिवार में काफी अच्छी थी। पानी की जगह दृध की नदीयां बहती थी। फिर किस बात की कमी थी ? यहां तक कि...वर्तमान चौवीशी के २४ तीर्थंकरो में से १६,१७,१८ वे श्री शान्तिनाथ, श्री कुंथुनाथ, श्री अरनाथ इन ३ तीर्थंकर भगवंतो को तो ६ खंड का चक्रवर्तीपने का राज्य मिला था। लाखों वर्षों का काफी लम्बा आयुष्य मिला था । इस अवनितल पर चक्रवर्ती सर्वोत्कृष्ट कक्षा के वैभवी ऐश्वर्यशाली पुरुष गिना जाता है। अमाप ऋद्धि-सिद्धि सम्पत्ति और समृद्धि उनके पास रहती है। फिर भी वे मात्र समृद्धि के कारण भगवान नहीं कहलाते हैं। आखिर उनकों भी सम्पूर्ण वैभव-ऐश्वर्य का सर्वथा त्याग करना ही पड़ता है। तथा महाभिनिष्क्रमण करके दीक्षा लेनी ही पडती है। निर्जराकारक धर्म करते हुए कर्मक्षय करने पर ही मुक्ति मिलती है। ऐसे थे १६वे शान्तिनाथ, १७वे कुंथुनाथ तथा १८वे अरनाथ भगवान । ये तो तीर्थंकर भगवान थे। इन्होंने पूर्व के तीसरे भव में तीर्थंकर नामकर्म उपार्जन किया था, अतः भगवान बनकर मोक्ष गए। लेकिन किसीने यदि तीर्थंकर नामकर्म नहीं भी उपार्जन किया हो फिर भी चक्रवर्ती बनते हैं। तथा छ खंड समस्त समृद्धि का त्याग करके दीक्षा लेकर निर्जरा धर्मोपासना करते हुए सर्व कर्म क्षय करके मोक्ष में जाते हैं। अन्यथा नहीं। . . भगवान बनने के लिए दीक्षा ग्रहण - शाश्वत आचार . . अन्तिम भव (जन्म) में भगवान बनना है । पूर्व के तीसरे जन्म से तीर्थंकर नामकर्म उपार्जन करके साथ ले आए हैं । अतः उन्हें संसारवास का त्याग करके दीक्षा ग्रहण करना अनिवार्य है। तीर्थंकर भगवान के लिए यह नित्य शाश्वत आचार धर्म है। व्यतीत अनन्त भूतकाल में अनन्त तीर्थंकर भगवान हुए हैं, उनमें से कोई एक भी भगवान ऐसे नहीं हुए जिन्होंने दीक्षा न ली हो । ठीक इसी तरह आगामी अनन्त भविष्यकाल में भी जो भी कोई भगवान बनेंगे वे निश्चित रुप से संसार का त्याग करेंगे और दीक्षा लेंगे। तब जाकर मोक्ष जाएंगे। इस तरह जैन धर्म में तीर्थंकर भगवान बनने के लिए दीक्षा ग्रहण एक शाश्वत नियम है। दुनिया के किसी अन्य धर्म में ऐसी कोई नियमबद्ध व्यवस्था ही नहीं है, इतना ही नहीं, दीक्षा ग्रहण तीर्थंकर भगवान के जीवन में एक कल्याणक के रुप में मानाया जाता है। जो सर्व के लिए कल्याणकारी प्रसंग होता है, उसे कल्याणक कहते हैं। हर किसीके जीवन की घटना कल्याणकारी नहीं बनती है, लेकिन तीर्थंकर भगवान के जीवन के जन्म से मृत्यु तक के प्रमुख पांच प्रसंग कल्याणकारी होने के कारण पंच कल्याणक के रुप में मनाए जाते हैं। १) च्यवन कल्याणक :- जिसमें भगवान बननेवाली आत्मा स्वर्ग से उतरकर इस अवनितल पर माता की कुक्षी में आती है। २) साडे नौं माह गर्भावस्था में रहकर जन्म लेने के प्रसंग को जन्म कल्याणक कहते हैं। ३) संसार, राजपाट वैभव, पुत्रपत्नी परिवार का, धन-सम्पनि आदि का त्याग करके संसार से महाभिनिष्क्रमण करके दीक्षा लेने के प्रसंग को दीक्षा कल्याणक कहते हैं। ४) भारी तपश्चर्या. ध्यानादि साधना. ६९७ आध्यत्मिक विकास यात्रा
SR No.002483
Book TitleAadhyatmik Vikas Yatra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorArunvijay
PublisherVasupujyaswami Jain SMP Sangh
Publication Year2007
Total Pages570
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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