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________________ के भांति भांति के लोग है । सब की इच्छाएँ एक जैसी तो हो ही नहीं सकती है । यह संभव भी नहीं है । और सभी अपनी-अपनी इच्छानुसार धर्म करेंगे तो ऐसे धर्म में भी एक वाक्यता का रहना संभव ही नहीं है। धर्म सदा काल तीनों काल में एक जैसा एक ही प्रकार का कैसे रहा? इच्छा के आधीन संभव ही नहीं है। अतःआज्ञाप्रधान ही धर्म होना चाहिए । आज्ञा भी किसकी होनी चाहिए? वीतरागी सर्वज्ञ भगवंत की आज्ञा ही सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ आज्ञा होती है। उनकी आज्ञा कल्याणकारी-हितकारी होती है । गुरु भगवंतों का कार्य तो यह है कि.. सर्वज्ञ भगवंतों की आज्ञा को परंपरा में सतत चलाना । वे स्वयं उस प्रकार की आज्ञा का आचरण–पालन करें और दूसरों को भी उसी आज्ञा का मार्ग बताना, कराना ही श्रेष्ठ मार्ग है। अतः अनादि-अनन्त काल से सर्वज्ञ तीर्थंकर वीतरागी भगवंतों की आज्ञा एक छत्र समान सतत चली आ रही है । ऐसी आज्ञा के धर्म का आचरण करने से अनन्त आत्माओं का कल्याण हुआ है । अनन्त आत्माएं सदा के लिये संसार से मुक्त हुई हैं । अतः जिनकी आज्ञारूप धर्म के आराधन से कितनों की मुक्ति हुई है, यह सब देखकर ऐसे महापुरुषों की आज्ञारूप धर्म स्वीकारने के लिए एवं आचरण करने के लिए जीवन समर्पित कर देना चाहिए। ___ “पुरुषविश्वासे वचनविश्वासः” नियम ऐसा है कि पुरुष में विश्वास आने से उनके वचन में विश्वास आता है । यदि सर्व प्रथम पुरुष में ही विश्वास नहीं आता है तो उसके वचन में भी विश्वास नहीं आता है । अतः वचन-आज्ञा जिसकी धारणे करनी हो सबसे पहले उन पुरुषों के स्वरूप को यथार्थ अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। यदि पुरुष विश्वसनीय निश्चित होता है तो फिर या होम करके उन के चरणों में जीवन समर्पित कर देना चाहिए। समर्पणभाव से उनकी शरण स्वीकारनी चाहिए। शरण के बीच में शर्त नहीं आनी चाहिए । शर्त शरणघातक है । और शरण शर्तघातक है । संपूर्ण शरण-समर्पणभाव है और पूर्ण समर्पितभाव ही सच्ची शरण है । अतः बिना किसी भी प्रकार की शर्त को बीच में लाए सम्पूर्ण रूप से शरण स्वीकार कर समर्पित होना चाहिए। यह नमस्कार भाव की. विनयगुण की पराकाष्ठा का फल है । बस, इसके बाद उनकी सभी आज्ञाएँ शिरोधार्य हो जाती हैं। उपरोक्त समर्पण भाव सम्यग्दर्शन के द्वारा ही सम्भव है । मिथ्यात्व के घर में बैठे हए पुरुष के लिए इस श्रेष्ठ कक्षा का समर्पणभाव आना असंभवसा लगता है। पुरुष विशेष परमात्मा या गुरु के प्रति वैसा समर्पित भाव आ जाने के पश्चात् उनकी आज्ञा बडे ही आदर सन्मानपूर्वक स्वीकार्य होगी। भावपूर्वक आज्ञा स्वीकार्य होने के पश्चात् वैसा ५९६ आध्यात्मिक विकास यात्रा
SR No.002483
Book TitleAadhyatmik Vikas Yatra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorArunvijay
PublisherVasupujyaswami Jain SMP Sangh
Publication Year2007
Total Pages570
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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