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________________ प्रस्तावना | ३१ चलती है, आचार्यवर के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता से भावविह्वल एवं हर्षविभोर हो जाती है। ऐसे महापुरुष इस वसुन्धरा के रत्न और मानवता के भूषण होते हैं । एकीकृत श्रमण संघ के पूर्व वे (पं० पूज्य आत्मारामजी महाराज) पंचनद प्रदेश के आचार्य परमपूज्य श्री काशीरामजी महाराज के सम्प्रदाय में उपाध्याय पद पर रहे । अनवरत श्रुतोपासना, श्रुत-सेवा, श्रुत-प्रसार श्रुत- शिक्षण इत्यादि उपाध्याय पद की विशेषताएँ उनमें मानो मूर्तिमती थीं । परमपूज्य आचार्यवर श्री काशीरामजी महाराज के दिवंगमन के पश्चात् वे पंचनदीय संघ के आचार्य पद पर अधिष्ठित हुए । उनका कार्यकाल परम यशस्वी रहा । तदनन्तर जैसा पहले उल्लेख किया गया है, समग्र संघ ने उन्हें आचार्य सम्राट के रूप में प्राप्त कर अपने को धन्य माना । ग्रन्थकार द्वारा अमर साहित्य-साधना प्रारम्भ से ही परमपूज्य श्री आत्मारामजी महाराज शास्त्रानुशीलन, चिंतन, मनन एवं निदिध्यासन में अनवरत अभिरुचिशील, उद्यमशील एवं गतिशील रहे । जैन आगम एवं दर्शन के साथ-साथ तुलनात्मक दृष्टि से उन्हें वैदिक दर्शन, बौद्ध दर्शन आदि अन्यान्य दर्शनों का भी तलस्पर्शी, गहन अध्ययन था । संस्कृत, प्राकृत आदि प्राच्य भाषाओं के वे पारगामी विद्वान् थे । वस्तुतः उनकी ज्ञानसम्पदा विशाल थी, महनीय थी । उन्होंने अपनी अर्जित विद्या द्वारा जिज्ञासुवृन्द को उपकृत करने हेतु तथा स्वान्तः सुखाय विपुल साहित्य का सर्जन किया। उन्होंने जो भी साहित्य रचा, वह अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण तथा उच्चस्तरीय है । उनकी शाश्वत समर्थ लेखनी अविश्रान्तगत्या चलती ही रहती थी । जैन आगम वाङ् मय पर आचार्य वर की निम्न कृतियाँ हैं ( ये सभी संस्कृतछाया, हिन्दी अनुवाद तथा विवेचन सहित हैं) १. आचारांग सूत्र २. स्थानांग सूत्र ३. समवायांग सूत्र ४. उपासकदशांग सूत्र ५.. अन्तकृद्दशांग सूत्र ६. अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र ७. निरयावलिका सूत्र सूत्र ८. कल्पातंसिका ६. पुष्पिका सूत्र 1 १०. पुष्पचूलिका सूत्र ११. वृष्णिदशा सूत्र १२. दशवैकालिक सूत्र १३. उत्तराध्ययन सूत्र १४. नन्दी सूत्र १५. अनुयोगद्वार सूत्र १६. वृहत्कल्प सूत्र १७. दशाश्रुतस्कन्ध सूत्र १८. आवश्यक सूत्र आगम वाङ् मय पर आचार्यवर का यह सर्जन वास्तव में एक ऐसा ठोस कार्य है, जो जैन संस्कृति, जैनधर्म और जैन दर्शन की सदा प्रभावना करता रहेगा । आचार्य वर द्वारा किये गये विवेचन एवं विश्लेषण में सर्वत्र उनके गहन अध्ययन, प्रखर पाण्डित्य तथा समीक्षात्मक व गवेषणात्मक प्रज्ञा के दर्शन होते हैं । मैं यहाँ यह प्रकट 1
SR No.002475
Book TitleJain Tattva Kalika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherAatm Gyanpith
Publication Year1982
Total Pages650
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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