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________________ ११६ : जैन तत्त्वकलिका बात हम प्रच्छन्न (गुप्त) रख सकते हैं। अतः इस बात पर पूर्ण विश्वास रख कर हमें अनुचित निकृष्ट हिंसादि प्रवृत्तियों या कार्यों से बचना चाहिए । लोक व्यवहार में यह देखा जाता है कि लोग अपने से बड़े, बुजुर्ग अथवा माता-पिता, शासक आदि के समक्ष या उनके जानते-देखते कोई भी अनुचित प्रवृत्ति नहीं करते। उनके अन्तःकरण में सदैव उनसे भय-सा बना रहता है कि कहीं ये हमारी अनुचित या निकृष्ट प्रवृत्ति या क्रिया को देख न लें। किन्तु अरिहन्त देव या सिद्ध परमात्मा अपने केवलज्ञान द्वारा त्रिकाल-त्रिलोक के भावों को पूर्णतः जानते-देखते हैं तो किसी भी समय अथवा किसी भी स्थान पर प्रकट या गुप्त रूप से भी हमें कोई भी अनुचित या निकृष्ट प्रवत्ति या क्रिया नहीं करनी चाहिए । वस्तुतः सर्वज्ञ तीर्थंकर देव या सिद्ध परमात्मा को मानने और उन पर श्रद्धा-भक्ति रखने का यही मुख्य प्रयोजन है। भला जब चर्मचक्षुवालों से इतनी भीति और लज्जा रखी जाती है कि उनके जानते-देखते कोई भी अनिष्ट या अनुचित कार्य नहीं किया जाता तो फिर दिव्य ज्ञानचक्ष वाले देवाधिदेव सर्वज्ञों से तो विशेष भोति और लज्जा रखकर कोई भी अनिष्ट या अनुचित प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये । जो लोग सर्वज्ञ वीतराग देव के प्रति श्रद्धा-भक्ति रखते हुए भी जानबूझकर अनुचित प्रवृत्ति या पाप कर्म करते हैं, वे नाम-मात्र के भक्त या उपासक हैं या सर्वज्ञात्मा तीर्थंकरदेव के नकली भक्त बनकर स्व-पर-वञ्चना करते हैं। जो लोग अरिहन्तदेव या सिद्ध परमात्मा के भक्त-अनुगामी, उपासक या श्रद्धालु बनकर तथा उन्हें सर्वज्ञ मानकर भी धष्टतापूर्वक पापाचरण करते हैं, बेखटके अनुचित-निकृष्ट प्रवृत्ति करते हैं, वे अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं। वे परमात्मवाद का दुरुपयोग करते हैं। जिस परमात्मवाद से वे आत्मिक विकास की सीढ़ियों पर चढ़ सकते थे, उसी के दुरुपयोग से आत्मिक पतन के गर्त में स्वयं को धकेलते हैं। परमात्मा की उपासना का मानव जीवन पर प्रभाव कई लोग कहते हैं, कि वीतराग सर्वज्ञ परमात्मा अपने ज्ञान में भले ही हमारे अच्छे-बुरे कर्मों के देखते रहें, हमारे कर्म (भाग्य) में परिवर्तन या हमारे कर्मक्षय वे नहीं कर सकते, हमारे अच्छे या बुरे कार्यों से उन्हें हर्ष-शोक नहीं होता, वे हमारे शुभाशुभ आचरण से हमें आशीर्वाद या शाप नहीं देते, फिर उनको मानने, उनका अवलम्बन लेने या उनकी श्रद्धा-भक्ति सति या उपासना करने से क्या लाभ है ?
SR No.002475
Book TitleJain Tattva Kalika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherAatm Gyanpith
Publication Year1982
Total Pages650
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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