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________________ पाप माँप से भी खतरनाक २४६ उसका अन्त दु.खदायी है । पाप की कल्पना प्रारम्भ में अफीम के फूल की तरह देखने में सुन्दर प्रतीत होती है, किन्तु उसका परिणाम अफीम की तरह कटु होता है। पाप के कटु फल प्रस्तुत अठारहवें अध्ययन में अर्हतर्षि वरिसवकृष्ण पाप और धर्म के कटु एवं मधुर परिणामों की चर्चा करते हुए पाप से बचने और धर्म में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते हैं। सर्वप्रथम वे पाप के कटु-परिणामों के विषय में कहते हैं प्रश्न- 'अयते खलु भो जीवो वज्जं समादियति से कहमेत ?' उत्तर-"पाणातिवाएणं जाब परिग्गहेणं, अरति जाव मिच्छा-दसणसल्लेणं वज्ज समाइत्ता, हथच्छेयणाई पायच्छे यणाई जाव अणुपरियटति णवमुद्देसगमेणं ।” . (प्रश्न)-जो जीव पाप (वद्य) का ग्रहण (सेवन और बन्ध) करता है, वह किन कारणों से और कैसे ? (उत्तर यह है-) जीव प्राणातिपात से लेकर परिग्रह और अरति से लेकर मिथ्यादर्शन-शल्य तक, इन अठारह पापस्थानों (के सेवन) से पाप का उपार्जन (ग्रहण या बन्ध) करता है। बाद में उसके फलस्वरूप बार-बार दुर्गतियों एवं कुयोनियों में जन्म लेकर हस्तच्छेदन, पादच्छेदन आदि असीम दुःखों का अनुभव करता हुआ, अनेक जन्मों तक संसार में परिभ्रमण करता रहता है । यह सब वर्णन नौवें अध्ययन में हम कर चुके हैं, उसी प्रकार जान लेना चाहिए। ___ वस्तुतः हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्मचर्य, परिग्रह आदि से लेकर मिथ्यादर्शनशल्य तक जो १८ पापस्थान (पाप के कारण) बताये हैं, उन पापों का सेवन करने के बाद देर-सबेर से उसका फल मिलता ही है। कई लोगों को तो तत्काल उसका कटु फल मिल जाता है । जो पाप के बीज बोता है, उसे पुण्य या धर्म के फल स्वप्न में भी नहीं मिल सकते हैं। यही कारण है कि हिंसा आदि पाप करके मनुष्य तत्काल तो बहुत खुश होता है, परन्तु जब वह पाप कर्म उदय 'में आता है, तब वह बहुत दुखी होता है। एक पंजाबी कवि ने कहा है हंसदे ने खिल-खिल जेहड़े रोवणगे यार कल नू। यम्मां ने लेखा लेणा, फड़के तलवार तेनू ॥ जो कसाई या हत्यारे आज हंस हंसकर दूसरों की गर्दन पर छुरियाँ
SR No.002473
Book TitleAmardeep Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Shreechand Surana
PublisherAatm Gyanpith
Publication Year1986
Total Pages282
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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