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________________ १३४ अमर दीप पुरिसो रहमारूढो, जोग्गाए विपक्ख जिहणं णेइ, सम्मदिट्ठी सत्तसंजुतो । तहा अणं ॥ २३॥ वह्नि- मारुय - संजोगा, जहा हेमं सम्मत्त-नाण-संजुत्ते, तहा पावं जहा आतव-संतत्तं वत्थं सुज्झइ वारिणा । सम्मत्त-संजुत्तो अप्पा, तहा झाणेण सुज्झती ॥२५॥ . कंचणस्स जहा धाऊ जोगेणं मुच्चए मलं । अणाइए वि संताणे, तवाओ कम्मसंकरं ॥२६॥ वत्थादिसु सुज्झेसु, संताणे गहणे तहा । दिट्ठ तं देसधम्मित्तं, सम्ममेयं विभावए ॥२७॥ अर्थात् - विपक्षी ( शत्रु) को रथारूढ़ पुरुष शत्रु को समाप्त कर कषाय शत्रु को सम्यग्दर्शन की देता है । . विसुज्झती । विसुज्झती ॥२४॥ हनन करने योग्य शक्ति से सम्पन्न देता है, इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी शक्ति से सम्पन्न साधक समाप्त कर - जैसे – अग्नि और हवा के संयोग से सोना शुद्ध हो जाता है, वैसे ही सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान से युक्त आत्मा पाप से विशुद्ध हो जाता है ! - जैसे - धूप से तप्त वस्त्र पानी से शुद्ध हो जाता है, वैसे ही सम्यक्त्व से युक्त आत्मा ध्यान से शुद्ध होता है । - धातु के संयोग से जैसे सोने का मैल दूर होता है, वैसे ही अनादि कर्म- संतति भी तप से नष्ट होती है । - वस्त्रादि की शुद्धि में और कर्म -संतति में दृष्टान्त-दान्तिक की योजना की गई है । दृष्टान्त सदैव एकदेशीय होता है । इस दृष्टान्त पर सम्यक् - प्रकार से इसकी विचारणा (घटित) करना चाहिए । अर्हतर्षि ने इन गाथाओं में आत्मशुद्धि के चार उपाय बताए हैं(१) सम्यग्दर्शनरूपी शक्ति से आत्मा पर आए हुए अनन्तानुबन्धी कषायमल को समाप्त करो । (२) स्वर्ण - विशुद्धि अग्नि और वायु के प्रयोग से होती है, तदनुसार सम्यग्दर्शन और सम्यग् ज्ञान से आत्मा को पाप से विशुद्ध बनाओ । (३) धूप से वस्त्र में हुए पसीने की जल से शुद्धि होती है, वैसे ही सम्यक्त्व से युक्त आत्मा की शुभध्यान से शुद्धि करो ।
SR No.002473
Book TitleAmardeep Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Shreechand Surana
PublisherAatm Gyanpith
Publication Year1986
Total Pages282
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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